Wednesday 29 September 2010

जो मैने समझा

स्वामी विवेकानंदजी की किताब पढ़ने से जो समझ में आया और महसूस भी किया कि आत्मा +मन हैं हम.मन ही असल में माया है.सुख दुःख के झूले में झूलता रहता है.कुछ अच्छा लगता है फिर नहीं लगता है.अरे भाई ,ऐसा तो होगा ही.कपड़े साफ़ हैं तो वे मैले तो होंगे ही.पसंद नहीं हैं ,कहने का क्या मतलब?साफ करो कपड़े को. जब तक हम मायानगरी में हैं ,इन द्वंदों से पाला तो पड़ेगा ही.इनके बिना ये मायानगरी बनेगी कैसे?अगर आनंदित रहना चाहते हैं तो अपने को इन द्वंदों से जोड़ें मत .
कपड़े अगर मैले हैं तो धो दें ,अगर मैले ही पहनने पड़ गये तो दुखी तो मन करता है न ,मत सुनिए मन की बात ,कपड़े ही तो मैले हुए हैं न आप तो मैले नहीं हुए.ऐसे ही जब मन किसी बात से खुश होता है ,तब भी मन से अलग हट कर मन को देखने की जरूरत है न कि मन के साथ एक हो जाने की.क्योंकि जब हम मन को देखना शुरू कर देतें हैं तभी उसे कंट्रोल कर सकते हैं.मन के साथ ए़क होकर हम खुद को भूल गये हैं.
दूसरी बातसमझ में आई कि जब हमे कोई ऐसा दुःख मिले कि उसे सहन करना ही पड़े तो सहन नहीं करें,स्वीकार करें.सहन करने से दुःख मिटता नहीं है ,स्वीकार करने से मिटता है.जब कभी अपने बच्चे के लिए हमे रात भर जागना पड़ता है,तब हम सहन नहीं कर रहे होते स्वीकार कर रहे होते हैं,क्योकि हमे अपने बच्चे से प्रेम होता है.इसीतरह हमे अस्तित्व के प्रति प्रेम होगा तो हम उस कष्ट को अपनी नियति मानते हुए खुशी से स्वीकार कर लेंगे.

Friday 24 September 2010

स्वामी विवेकानंद कहते हैं

वेदांत में वैराग्य का अर्थ है- जगत को ब्रह्मरूप देखना .जगत को हम जिस भाव से देखते हैं,उसे हम जैसा जानते हैं,वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभासित होता है ,उसका त्याग करना और उसके वास्तविक रूप को पहचानना .
उसे ब्रह्मस्वरूप देखो.वास्तव में ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है.इसी कारण जगत में जो कुछ भी है उसे ईश्वर से ढक लेना होगा.
जीवन में, मरण में, सुख में ,दुःख में सभी तरह की अवस्थाओं में ईश्वर समान रूप से विद्यमान है, तुम कोई भी नहीं हो.मैं भी कोई भी नहीं हूं,कोई भी कोई नहीं है.सब उस प्रभु की ही वस्तुएं हैं ईश्वर तुम्हारे भोग्य धन में है,तुम्हारे मन में जो वासनाएं उठती हैं,उनमे है,अपनी वासना से प्रेरित हो जब तुम जो जो द्रव्य खरीदते हो,उनमे भी वह है.और तुम्हारे सुंदर अलंकारों मै भी वही है.

Wednesday 22 September 2010

ईश्वर की माया और प्रेम

रोशनी का अभाव अँधेरा है .सत्य का अभाव झूठ है .पर अँधेरे का कभी अभाव नहीं होता,न ही झूठ का कभी अभाव होता है.अभाव उसी का होता है जिसका कोई भाव हो.अँधेरे और झूठ का कोई भाव ही नहीं होता तो अभाव कैसा ?असल में ये हैं ही नहीं सिर्फ मायाजाल है ,एक माचिस की तीली जलाते ही अँधेरा भाग जाता है.सच्चाई के सामने झूठ नहीं टिकता ,ठीक इसीतरह हैं क्रोध,घृणा द्वेष ,लालच आदि दुर्गुण.जोकि असल में तो हैं ही नहीं .पर चूँकि प्रेम नहीं है ,प्रेम का अभाव हो गया है सो ये नजर आतें हैं.प्रेम का प्रकाश फैलते ही न तो क्रोध टिकता है न ही घ्रणा द्वेष लालच .सो जरुरत प्रेम की है.

Saturday 18 September 2010

अदृश्य शक्ति का मायाजाल

क्या मैंने इस लैपटॉप को बनाया है ?क्या मैने गूगल.कोम को बनाया है,क्या मै इस ब्लॉग सिस्टम को बना सकती थी.इस बिस्तर को, इस तकिये को जिसका सहारा लेकर मै लिख रही हूं .इस मकान को, इस शहर को , आखिर कहाँ तक गिनाया जाय,कुछ भी तो मैने नहीं बनाया.और ये सब कुछ कोई एक व्यक्ति तो बना भी नहीं सकता.हर जरा सी चीज के निर्माण में अनगिनत व्यक्तियों का हाथ होता है,मरे पास जो कुछ भी है.जो कुछ भी मै खाती पीती हूं उन सब को कितने ही हाथ स्पर्श कर चुके हैं ,सोचते ही सिहरन सी होती है .हमारे स्वयं के निर्माण मे भी तो न जाने कितनों का हाथ है .तो फिर क्या हम कुछ भी नहीं.नहीं ऐसा भी नहीं.हम सब कुछ हैं पर अकेले कुछ भी नहीं.एक अदृश्य शक्ति है जो सबसे काम ले रही है.उस अदृश्य शक्ति से जुड़ कर ही सब कुछ हैं.वही शक्ति लोगों के दिल दिमाग में भर देती है कि वे अकेले कुछ भी कर सकते हैं.शायद इसे ही मायाजाल कहते हैं . अगर मायाजाल न हो तो संसार बनेगा ही नहीं.हम मायाजाल से बने इस अद्भुत संसार का आनंद उठा सकते हैं अगर स्वंय को उस अदृश्य शक्ति के साथ जोड़ लें. निर्णय करने में हम पूरी तरह से स्वतंत्र हैं.

Wednesday 15 September 2010

संसार संसार ही रहेगा

संसार को कोई कभी भी नहीं सुधार सकता.हमेशा ही उसमे फिफ्टी फिफ्टी का चक्कर रहेगा,यानि आधा शुभ आधा अशुभ.सुख और दुःख उसमे हमेशा बराबर बने रहते हैं.उसी स्थिति का नाम ही तो संसार है.हम अच्छा ,बुरा कुछ भी न करें तो संसार में रहेंगे.पर इंसान कुछ भी किये बिना रह ही नहीं सकता.कभी अच्छा करता है कभी बुरा.उसी के अनुसार उसके मनोभाव बदलते रहते हैं,कभी उसे लगता है वह स्वर्ग में है कभी लगता है नरक मै है.स्वर्ग में हैं तब तो सोचना ही क्या,पर अगर लगता है कि कहाँ नरक में आ गये हम. नरक से निकलना चाहते हैं तो सिर्फ एक ही तरीका है वहाँ से निकलने का,मन ही मन माफी मांगिये उससे ,जिसके कारण आप तकलीफ पा रहे हैं.आपने उसे दुःख पहुचाया है जाने अनजाने में ,अब वही दुःख आपको दुखी कर रहा है.क्षमा मांग कर फिर से संसार में कदम रखिये. आप को लगता है कि गलती तो उसकी है क्षमा उसे मांगनी चाहिए तब भी मन ही मन आप क्षमा मांगे.नरक से छुटकारा तो आपको चाहिए.उसे नहीं.शुभ करिए और स्वर्ग में स्थान प्राप्त करिये.संसार को बदलने का ठेका मत लीजिए.अपना स्थान देखिए आप कहाँ पर हैं.संसार तो हमेशा ही मिलाजुला रहने वाला है.

Saturday 11 September 2010

बन जाओ योगी

जितने भी महापुरुष हुए हैं ,सब पर तरह तरह की विपदायें आयी हैं .महात्मा गाँधी हों या दलाईलामा.भगवान बुद्ध हों या ओशो.
राम ,कृष्ण जिन्हे हम भगवान मानते हैं ,उन पर भी कष्ट आये हैं.उन्होंने भी दुश्मनों का सामना किया है.
पांच पांडवो ने भी कम कष्ट नहीं झेले .और हम ये भी मानते हैं कि हमारी विपदायें हमारे ही कर्मों का फल हैं.तब इसका मतलब यह हुआ कि इन सारी महान विभूतियों ने कुछ अच्छे कर्म नहीं किये थे,जिनका फल उन्हें इस तरह मिला.
राम ,कृष्ण के लिए तो कहा जाता है कि वे तो लीला कर रहे थे.सब कुछ जानते थे,सिर्फ संसार को कष्टों से मुक्त करने के लिये अवतार लिया था और साधारण मनुष्यों की तरह कष्ट भोगते हुए उनका मुकाबला करना सिखाया आम लोगों को.उनके लिये तो सब खेल था ,लीला थी.
तो क्या हम सब भी उसी लीला का अंग नहीं हैं.हमे भी तो उसकी लीला में खेल करने के लिए एक पार्ट मिला हुआ है.हमे उस पार्ट को अच्छी तरह से अदा करना है. इसलिए हमे हमेशा याद रखना होगा कि हम उस प्रभु की लीला में एक पार्ट अदा कर रहें हैं,तब तो हम अच्छी तरह से अपनी जिम्मेदारी निबाह पायेंगे .
जो ईश्वर को भूल कर इसतरह जीता है कि अपने बल पर खूब मेहनत कर के तरक्की करेगा,अपने बल पर पूरी दुनिया पर राज करेगा.खूब सारी धन दोलत इकट्ठा करेगा.वह जब आख़िरी समय आता है तब महसूस करता है कि सारी भागदौड़ बेकार ही थी.आखिर क्या पाने के लिए दिन रात का सुखचैन गवाया .कितनों से दुश्मनी मोल ली .पिछले जन्म का तो कुछ याद नहीं कि कैसे कर्म किये थे पर इस जन्म अपना प्रभुत्व जमाने के लिए न जाने कितनों के दिल दुखा दिए .सो हमे अपने को ईश्वर की लीला का हिस्सा मानते हुए अपने हिस्से की जिम्मेदारी खुशी खुशी निभानी चाहिए,पार्ट चाहे जो भी हो.कहने का मतलब है कि सुख और दुःख दोनों हर इंसान के हिस्से में बराबर बराबर आते हैं,उनके प्रकार अलग अलग होते हैं.जो लोग उपर से बिलकुल सुखी लगते हैं उनके मन की हालत उन्हें ही पता होती है.पर कई मन के राजा होते हैं पर देखने मै कंगाल लगते हैं.अन्तर सिर्फ सोच का है,ईश्वर से अपने को अलग मानते ही हम उसकी लीला से अलग एक निरीह प्राणी बन जातें हैं,और उससे अपने को जोड़ते ही उसकी लीला के महत्त्वपूर्ण पात्र बन जाते हैं.तो हमे हमेशा अपने को ईश्वर से जोड़कर देखनाहोगा .जोड़ना ही तो योग कहलाता है इससे हम योगी बन जाते है.अलग होते ही भोगी हो जाते हैं.भोगी तो कष्ट भोगता ही है , कोई भी सुख बिन दुःख की छाया के नहीं मिलता क्योकि दोनों जुडे हुए हैं दिन और रात की तरह.इसलिए योगी बनो और हमेशा परमानन्द में रहो.

Tuesday 7 September 2010

मुझे कुछ नहीं कहना है

तुम खुश नहीं लग रही हो ,
हाँ, मैं खुश नहीं हूँ
तुम ईश्वर में विश्वास रखती हो.
हाँ,रखती हूँ.
गलत,बिलकुल गलत.
या तो कहो,खुश हो.-सिर्फ नाटक कर रही हो न खुश होने का
या फिर कहो कि ईश्वर पर भरोसा नहीं है .
अगर मानती हो,और फिर भी खुश नहीं हो तो
ये तो ऐसे हो गया जैसे कोई किसी सवारी से कहीं जा रहा हो ,
और फिर भी बोझ सर पर लादा हुआ हो .
अरे भाई, जो सवारी तुम्हारा बोझ उठारही है ,
वही तुम्हारे सामान का बोझ भी तो उठा ही रही है.
तो सर से उतार दो उसे .
अगर जवाब है कि ईश्वर को नहीं मानती हो तो फिर तो तुम्हे पूरा हक है दुखी
होने का.
तरीके खोजती रहो खुश होने के ,
फिर मुझे कुछ नही कहना.

Saturday 4 September 2010

दुनिया बीमार सी क्यों है?

शरीर के अंदर न जाने क्या कुछ चलता रहता है.हमे तो कुछ दिखाई नहीं देता.कैसे भोजन पच जाता है?कैसे खून बन जाता है?कैसे साफ़ हो जाता है?कैसे नाख़ून बन जातें हैं? कैसे मांस बन जाता है? कैसे नींद आ जाती है? कैसे आँख खुल जाती है?सोचने बैठो तो करिश्मों का कोई अंत नही नजर आता. पर हमारे बस में अगर कुछ है तो यह किहम नियमानुसार चलते रहें. जहाँ कहीं बेतरतीबी की कि उसका असर हमारे शरीर पर दिखने लग जाता है.तरह तरह के रोग घर कर लेते हैं .सो नियमानुसार चलना जरूरी हो जाता है.हीक इसी तरह यह बाहर की दुनिया भी है.यहाँ भी कुछ नियम काम करतें हैं.अगर हम नियम से चलें जैसे कि समय से अपनी ड्यूटी पूरी करें.आदर से हर एक से बात करें.जो काम जिस तरह से करना चाहिए उसी तरह से करें.तो काहे की मुसीबत हो.पर ऐसा होता नहीं है,हम अपना काम समय से नहीं करतें हैं,हम हर एक को आदर भी नहीं देतें हैं हम जैसेतैसे काम निबटाते हैंऔर फिर जब दुनिया की शक्ल बीमार नजर आती है तो दुखी होते हैं.