Saturday 4 September 2010

दुनिया बीमार सी क्यों है?

शरीर के अंदर न जाने क्या कुछ चलता रहता है.हमे तो कुछ दिखाई नहीं देता.कैसे भोजन पच जाता है?कैसे खून बन जाता है?कैसे साफ़ हो जाता है?कैसे नाख़ून बन जातें हैं? कैसे मांस बन जाता है? कैसे नींद आ जाती है? कैसे आँख खुल जाती है?सोचने बैठो तो करिश्मों का कोई अंत नही नजर आता. पर हमारे बस में अगर कुछ है तो यह किहम नियमानुसार चलते रहें. जहाँ कहीं बेतरतीबी की कि उसका असर हमारे शरीर पर दिखने लग जाता है.तरह तरह के रोग घर कर लेते हैं .सो नियमानुसार चलना जरूरी हो जाता है.हीक इसी तरह यह बाहर की दुनिया भी है.यहाँ भी कुछ नियम काम करतें हैं.अगर हम नियम से चलें जैसे कि समय से अपनी ड्यूटी पूरी करें.आदर से हर एक से बात करें.जो काम जिस तरह से करना चाहिए उसी तरह से करें.तो काहे की मुसीबत हो.पर ऐसा होता नहीं है,हम अपना काम समय से नहीं करतें हैं,हम हर एक को आदर भी नहीं देतें हैं हम जैसेतैसे काम निबटाते हैंऔर फिर जब दुनिया की शक्ल बीमार नजर आती है तो दुखी होते हैं.

1 comment:

  1. दुखी होने के बजाय हँस भी तो सकते हैं अपनी ही नादानियों पर !

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