Friday 24 September 2010

स्वामी विवेकानंद कहते हैं

वेदांत में वैराग्य का अर्थ है- जगत को ब्रह्मरूप देखना .जगत को हम जिस भाव से देखते हैं,उसे हम जैसा जानते हैं,वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभासित होता है ,उसका त्याग करना और उसके वास्तविक रूप को पहचानना .
उसे ब्रह्मस्वरूप देखो.वास्तव में ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है.इसी कारण जगत में जो कुछ भी है उसे ईश्वर से ढक लेना होगा.
जीवन में, मरण में, सुख में ,दुःख में सभी तरह की अवस्थाओं में ईश्वर समान रूप से विद्यमान है, तुम कोई भी नहीं हो.मैं भी कोई भी नहीं हूं,कोई भी कोई नहीं है.सब उस प्रभु की ही वस्तुएं हैं ईश्वर तुम्हारे भोग्य धन में है,तुम्हारे मन में जो वासनाएं उठती हैं,उनमे है,अपनी वासना से प्रेरित हो जब तुम जो जो द्रव्य खरीदते हो,उनमे भी वह है.और तुम्हारे सुंदर अलंकारों मै भी वही है.

1 comment:

  1. यदि ऐसा अनुभव होने लगे तब तो हम जीते जी मुक्त हो गए !

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