Monday 25 October 2010

पति परमेश्वर

आज करवाचौथ है तो मन में एक ख्याल आया कि क्या आज भी पत्नी अपने पति को अपना परमेश्वर मानती हैं.
जिस देश मे पत्थर को भी भगवान मान कर पूजा की जाती हो वहाँ पति को परमेश्वर का दर्जा देना बिल्कुल स्वभाविक बात है.आखिर परिवार में पत्नी का केंद्रबिंदु पति होता है .और बच्चों की केंद्रबिंदु माँ होती है.
पुरुष की जिम्मेदारियां स्त्री की जिम्मेदारियों से अलग तरह की होती हैं .ये बात और है कि हमेशा ही कुछ स्त्रियाँ पुरुषों की तरह की जिम्मेदारियां वहन कर लेती हैं.पर तब हम उस स्त्री के बारे मे कहते हैं कि इसमें तो मर्दों जैसी हिम्मत है.और जो पुरुष स्त्री जैसी जिम्मेदारी निबाह लेते हैं,उन्हें स्त्रियों जैसा कोमल ह्रदय रखने का ख़िताब मिलता है
जैसे बच्चे की रक्षा के लिए माँ के अंदर छिपे हुए हिम्मत बहादुरी शोर्य जैसे मर्दों वाले गुण प्रकट हो जातें हैं.उसी तरह एक पत्नी जब पति को परमेश्वर मानते हुए समर्पित होती है तो पति के अंदर छिपे हुए प्रेम और शांति के नारी सुलभ गुण प्रकट हो जाते हैं.
स्त्री व पुरुषों को ए़क दूसरे के गुण तो अपनाने ही चाहिए उसके बिना तो वे दोनों अधूरे हैं इसीलिये तो दुर्गा माँ को शेर की सवारी करते हुए और हथियारों से लैस दिखाया जाता है.और कृष्ण भगवान को फूलों का श्रंगार करके बांसुरी बजाते हुए दिखाते हैं.
जिस तरह बच्चे का जन्म होते ही माँ का भी जन्म हो जाता है,उसी तरह स्त्री जब पत्नी के रूप मे पूरी तरह समर्पित होती है तभी पुरुष पति परमेश्वर बनता है.स्त्री के अहं की संतुष्टि माँ के रूप से होती है .माँ से ही तो परमेश्वर का जन्म होता है.
परमेश्वर का दर्जा देने का कारण ये भी है कि सारे इंसानी रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमे कहीं न कहीं कोई पर्दा रहता है.सिर्फ परमेश्वर से हम कुछ भी छिपा कर नहीं रख सकते.जिस तरह बच्चे अपनी माँ से कुछ नहीं छुपाते उसी तरह एक समर्पित पत्नी अपने पति से कुछ नहीं छुपाती.

Tuesday 19 October 2010

ओशो का सत्संग

ओशो का ये सत्संग मुझे बहुत अच्छा लगा .अपने शब्दों मे लिखने का प्रयास करती हूं.
हम अपने ही शरीर के मालिक नहीं बनते हैं,हमारे शरीर रूपी मकान मे पांच नौकर हैं.आँख ,नाक, कान ,जीभ,और चमड़ी .हमने अपनें नौकरों को इतनी ज्यादा पावर दे दी है कि वह खुद को ही मालिक समझने लगे हैं.हम चुपचाप देखते रहतें हैं ,कभी तो देखते भी नहीं.आँखें बंद किये पड़े रहते हैं. जब शरीर में कोई उपद्रव होता है ,बीमारी होती है तब हमारी आँखे खुलती हैं.आखें अपने को मालिक समझते हुए टीवी के सामने बैठे रहना चाहती है. सत्संग या कोई अन्य ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देखने सुनने के बजाय आँखे और कान रोने धोने के या उत्तेजक डांस गानों के चैनल देखने सुनने लग जाते हैं.जीभ अपने को मालिक समझते हुए मिठाई चाट पकोड़ी का आनंद लेना चाहती है,स्वादिष्ट नाश्ता खाने के चक्कर मे पोष्टिक अंकुरित मूंग पड़ी रह जाती है.नाक को ताजे फूलों की खुशबू नहीं बनावटी डेडोरेन्ट और परफ्यूम चाहिए. चमड़ी रेशमी मुलायम कपड़ो का आनंद लेना चाहती है.सुबह समय से उठने के बजाय नरम बिस्तर को छोडना ही नहीं चाहती.सो व्यायाम करने की फुरसत ही नहीं मिलती.ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि हम स्वयं सोये हुए हैं.और इस बात का फायदा उठाते हुए नौकर मालिक बन गये हैं.

Thursday 14 October 2010

मन का संतुलन

आज के विचार कुछ इस तरह से आ रहे हैं कि हम जब भी कोई मूवी देखते हैं तो उसमे देखतें हैं कि कितने सारे पात्र कितनी तरह का रोल कर रहे हैं पर रोल करते समय उन्हें पता होता है कि वे रोल कर रहे हैं.उस रोल को निबाहने के बाद अपने साथी पात्रों के साथ नार्मल व्यवहार करते हैं,रोल के अनुसार नहीं.रोल में वे आपस मे भाई बहन हो सकते हैं,मित्र हो सकते हैं,दुष्मन हो सकते हैं .पर रोल के बाहर आपसी रिश्ता एक्टर का होता है.शाहरुख को पता होता है कि वह देवदास नही है,एश्वर्या को पता होता है कि वह पारो नहीं है.ठीक इसी भावना के तहत हम अपना रोल प्ले करें तो.....,हमे हमेशा याद रखना चाहिए कि जन्म लेते ही हमें जो शरीर मिला है नाम मिला है,धर्म मिला है ,पोजिशन मिली है .कहीं हम सीनियर होते हैं कही जूनियर होतें हैं,कभी ताकतवर होते हैं कभी कमजोर होते हैं.ये सब बाहर की अवस्थाएं हैं जो बदलती रहती हैं.असल में हम इसके अंदर हैं,और वह अवस्था हमेशा एक जैसी रहती है कभी नहीं बदलती.वह न हिंदू है न मुसलमान है.अमीर है न गरीब है.सभी के भीतर वह अवस्था सदा एक जैसी है.अगर उस अवस्था का हमे हमेशा ख्याल बना रहे तो हम अपना रोल प्ले करते समय अपना संतुलन कायम रख पायेगें.

Wednesday 6 October 2010

मोह श्रंखला (जहाये आछे बाधा )

महान कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर की कविता जो मुझे बहुत पसंद है.


मेरे मोह की जंजीर बड़ी द्रढ़ है
तू उसे तोड़ दे ,यही मेरी कामना है.
किन्तु उसे तोड़ते हुए मेरा मन दुखी हो जाता है,
मुक्ति मांगने के लिए मैं तेरे पास जाता हू,
किन्तु मुक्ति की आशा से भयभीत हो जाता हूं.
मेरे जीवन मे तू ही मेरी सर्वश्रेष्ठ निधि है,
तुझसा अनमोल धन दूसरा कोई नहीं
.यह मै जानता हूं,किन्तु मेरे घर मे जो टूटे फूटे बर्तन हैं ,
उन्हें भी फैकने को दिल नहीं मानता .जो आवरण मेरे शरीर पर पड़ा है,ह्रदय पर पड़ा है ,
धूल धुसरित है और म्रत्यु के श्राप से ग्रसित है.
मेरा मन उसे धिक्कारता है,तो भी उससे मुझे लगाव है
मेरे ऋणों का अंत नहीं है ,मेरे खाते मै अनेक जनों की रकमें जमा हैं
मेरे जीवन की विफलताएं बड़ी हैं ,मेरी लज्जा की सीमा नहीं.
फिरभी जब कल्याण की भीख मांगने तेरे सामने आता हूं
तो मन ही मन डर से काँपता हूं,
कही मेरी भीख स्वीकार न हो जाये ,
कहीं मेरे शरीर व ह्रदय के मैले आच्छादन को तू उतार न ले.
मेरी बंधन श्रंखला को तू तोड़ न दे.

Monday 4 October 2010

नशा-जो मन के पार ले जाये

पिक्चर्स मे देखा है कि जब भी किसी को कोई दिल की बात जुबान पर लानी होती है तो शराब का नशा काम आता है.या तो कोई अपनी मर्जी से पीता है या धोखे से पिलाई जाती है.तो इसका मतलब क्या निकलता है.मेरे ख्याल से उस समय वह मन के पार हो जाता है.उसी के मन का उस पर कोई कंट्रोल नहीं होता.इसलिए वह अपने को मुक्त महसूस करता है पर शराब का नशा कुछ देर का ही होता है,और साथ ही उसके शरीर के लिए नुकसानदायक होता है.पर जब तक नशा न हो तब तक व्यक्ति अपने को भूल नहीं पाता,और भूले बिना उसे आनंद नहीं मिल सकता ,क्योंकि स्वयं में उसे ढेरों कमियां दिखती हैं कमजोरियां दिखती हैं.पूरी जिन्दगी कोई अपने को परफेक्ट बनाने में लगा दे तब भी नहीं बना सकता क्योंकि हर व्यक्ति की क्षमताओं की अपनी सीमा है.पर चोबीसों घंटे तो शराब के नशे मे रहना कोई समस्या का हल तो नहीं.इस नशे की बेहोशी मे वह बहुत कुछ ऐसा भी कर बैठता है जिसका उसे होश आने पर बहुत पछतावा होता है.लेकिन नशा तो चाहिए इंसान को .खोज इस बात की है कि कौन सा नशा है जो भगवान बुद्ध को भी मुस्कराने पर मजबूर कर देता है.जिसके नशे मे राम और कृष्ण भी मुस्कराते रहतें हैं मुझे लगता है कि वह है अपने अस्तित्व के प्रति प्रेम का नशा .कोई जरा रुक कर देखे इस अस्तित्व को जिसका जरा सा हिस्सा हमारा यह संसार भी है तो वह इसके प्रति एक ऐसी श्रधा से भर जायगा कि अपने को भूल जायेगा,उसे याद ही नहीं रहेगा कि वह ए़क अधूरा व्यक्तित्व है.उसे समझ आने लगेगा कि वह इस अस्तित्व का ही अटूट हिस्सा है.फिर कैसी कमी और कैसा दुःख.