Wednesday 6 October 2010

मोह श्रंखला (जहाये आछे बाधा )

महान कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर की कविता जो मुझे बहुत पसंद है.


मेरे मोह की जंजीर बड़ी द्रढ़ है
तू उसे तोड़ दे ,यही मेरी कामना है.
किन्तु उसे तोड़ते हुए मेरा मन दुखी हो जाता है,
मुक्ति मांगने के लिए मैं तेरे पास जाता हू,
किन्तु मुक्ति की आशा से भयभीत हो जाता हूं.
मेरे जीवन मे तू ही मेरी सर्वश्रेष्ठ निधि है,
तुझसा अनमोल धन दूसरा कोई नहीं
.यह मै जानता हूं,किन्तु मेरे घर मे जो टूटे फूटे बर्तन हैं ,
उन्हें भी फैकने को दिल नहीं मानता .जो आवरण मेरे शरीर पर पड़ा है,ह्रदय पर पड़ा है ,
धूल धुसरित है और म्रत्यु के श्राप से ग्रसित है.
मेरा मन उसे धिक्कारता है,तो भी उससे मुझे लगाव है
मेरे ऋणों का अंत नहीं है ,मेरे खाते मै अनेक जनों की रकमें जमा हैं
मेरे जीवन की विफलताएं बड़ी हैं ,मेरी लज्जा की सीमा नहीं.
फिरभी जब कल्याण की भीख मांगने तेरे सामने आता हूं
तो मन ही मन डर से काँपता हूं,
कही मेरी भीख स्वीकार न हो जाये ,
कहीं मेरे शरीर व ह्रदय के मैले आच्छादन को तू उतार न ले.
मेरी बंधन श्रंखला को तू तोड़ न दे.

1 comment:

  1. इसका अर्थ हुआ कि भगवान भी मिल जाएँ तो मानव उन्हें छोड़कर अपने सपनों को संभालेगा!

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