Tuesday 19 October 2010

ओशो का सत्संग

ओशो का ये सत्संग मुझे बहुत अच्छा लगा .अपने शब्दों मे लिखने का प्रयास करती हूं.
हम अपने ही शरीर के मालिक नहीं बनते हैं,हमारे शरीर रूपी मकान मे पांच नौकर हैं.आँख ,नाक, कान ,जीभ,और चमड़ी .हमने अपनें नौकरों को इतनी ज्यादा पावर दे दी है कि वह खुद को ही मालिक समझने लगे हैं.हम चुपचाप देखते रहतें हैं ,कभी तो देखते भी नहीं.आँखें बंद किये पड़े रहते हैं. जब शरीर में कोई उपद्रव होता है ,बीमारी होती है तब हमारी आँखे खुलती हैं.आखें अपने को मालिक समझते हुए टीवी के सामने बैठे रहना चाहती है. सत्संग या कोई अन्य ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देखने सुनने के बजाय आँखे और कान रोने धोने के या उत्तेजक डांस गानों के चैनल देखने सुनने लग जाते हैं.जीभ अपने को मालिक समझते हुए मिठाई चाट पकोड़ी का आनंद लेना चाहती है,स्वादिष्ट नाश्ता खाने के चक्कर मे पोष्टिक अंकुरित मूंग पड़ी रह जाती है.नाक को ताजे फूलों की खुशबू नहीं बनावटी डेडोरेन्ट और परफ्यूम चाहिए. चमड़ी रेशमी मुलायम कपड़ो का आनंद लेना चाहती है.सुबह समय से उठने के बजाय नरम बिस्तर को छोडना ही नहीं चाहती.सो व्यायाम करने की फुरसत ही नहीं मिलती.ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि हम स्वयं सोये हुए हैं.और इस बात का फायदा उठाते हुए नौकर मालिक बन गये हैं.

1 comment:

  1. नोकर नहीं नौकर मालिक बन गए हैं और इन का लीडर है हमारा मन और लीडर को भी नचाती है हमारी बुद्धि! तो कुल मिलाकर हुए सात , हम अकेले करें भी तो क्या?

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