Monday 1 November 2010

खुला आकाश हो जैसे

मंदिर मे लगातार घंटी बजाना क्या अर्थ रखता है?या शिवलिंग पर जल चढ़ाना या कोई भी पूजा करने का जो कर्मकांड है,उसका क्या तात्पर्य है?मेरे दिमाग मे जो आ रहा है वह यह है कि हम जो भी करते हैं दिमाग से करते हैं और दिमाग से करने का अर्थ है कि उसमे कोई अर्थ ढूंढना, लोजिक ढूंढना.जब कोई मतलब नहीं मिलता तो दिमाग को संतुष्टी नहीं होती.दिमाग वह करना नहीं चाहता.
तो यही है उस बात का उत्तर कि हम अन्लोजिकल कर्मकांड क्यों करते हैं?इसलिए करते है कि हम अपने दिमाग से बाहर आ जायें.दिमाग की सीमा मे रह कर तो हम वही और वैसा ही सोचेंगे जैसाकि हमारा दिमाग है.कोई कैसा दिमाग रखता है तो कोई कैसा ?दिमाग ही सुख दुःख के बंधन मे डालता है.पर ईश्वर दिमाग से पकड़ मे आने वाला नहीं है. वह दिमाग से परे की बात है.सो दिमाग को एक तरफ रख कर कर्मकांड करना होता है.वह चाहे लगातार राम नाम का जाप हो या जल चढ़ाना हो.दिमाग को बीच मे मत लाओ.
जैसे हमारे रहने का एक घर होता है.पर उसमे लगातार कोई भी नहीं रह सकता.तो हर घर मे एक खुला आंगन ,खुली छत भी होती है..गरीब हों या अमीर सब थोड़ी देर के लिए खुले आकाश में आते ही हैं और आना ही चाहते हैं.कभी कभी साप्ताहिक तौर पर पिकनिक मनाने कुछ घंटों के लिए और कभी कैम्पिंग के लिए कुछ दिनों के लिए भी जाते हैं.यानि हरेक अपनी चारदीवारी से बाहर निकल कर खुशी महसूस करता है.उसी तरह से हमारा दिमाग है जिसमे हम लगातार रहते रहते घुटन महसूस करते हैं.उससे बाहर जाने का रास्ता है रामनाम का जपना .लोजिकल बातों से हटना.जहाँ कमजोर दिमाग श्रेष्ठ दिमाग सब बराबर होते हैं .करके देखो और शांति का अनुभव लो.थोड़ी देर रोज. फिर साप्ताहिक तौर पर कुछ घन्टों के लिए और फिर कुछ दिनों के लिए.क्योंकि ईश्वर दिमाग के अंदर नहीं बाहर है.

1 comment:

  1. सही है , ईश्वर दिल में रहता है , दिमाग में नहीं, वह भाव का भूखा है विचार से कोसों दूर भागता है....

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