Monday, 17 January, 2011

ब्राह्मण,क्षत्रिय ,वैश्य और शुद्र

ओशो की सी.डी.में सुना कि मुख्यतः दो तरह के लोग होते हैं ,एक ब्राह्मण दूसरा क्षत्रिय .अंतर्मुखी ब्राह्मण होता है और बहिर्मुखी क्षत्रिय होता है.अंतर्मुखी अपने में ही मस्त रहता है.जो सिर्फ शरीर के तल पर ही जीता है ,वह शुद्र होता है.शरीर
से उपर उठकर बुद्धि के स्तर पर जीनेवाला ब्राह्मण होता है.बहिर्मुखी अपने को प्रदर्शित करना चाहता है ,जो पूरी तरह से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर पाता है वह क्षत्रिय होता है,जो नहीं कर पाता वह वैश्य होता है.
एकतरह से कह सकते हैं कि ब्राह्मण और शुद्र एक ही जाति के दो छोर हैं ,एक छोर पर शुद्र खड़ा है लोगों की सेवा करता अपने शारीरिक बल से,तो दूसरे छोर पर ब्राह्मण खड़ा है लोगों की सेवा करता अपने दिमाग से.दोनों ही लोकसेवक हैं.
इसी तरह एक छोर पर क्षत्रिय हैं तो दूसरे छोर पर वैश्य हैं.क्षत्रिय सुरक्षा की गारंटी देता है तो वैश्य वह देता है जिसकी सुरक्षा चाहिये.
और कब वैश्य क्षत्रिय में रूपांतरित हो जायें और क्षत्रिय वैश्य में पता ही नहीं चलता है.तभी तो सेना में घोटाले होते हैं ,रक्षा करने के बजाय वे व्यापार शुरू कर देते हैं,और व्यापारी अपने हाथ में हथियार उठा लेता हैं.दोनों जातियों में रक्षा की भावना प्रमुख है
इसी तरह जब शुद्र पढ़लिख जाता हैतो वह दिमाग से सेवा करने लगता है,और जब ब्राह्मण अनपढ़ रह जाता है तो वह हाथ पैर से सेवा करता है.दोनों जातियों में सेवा भाव है.

1 comment:

  1. ब्राहमण व शूद्र एक ही जाति के दो छोर हैं यह तो आज नयी बात पता चली, इसका अर्थ हुआ शूद्र भी अंतर्मुखी है ? सुंदर विचार !

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