Wednesday, 30 March, 2011

नजर नजर का फेर

हमारे प्रति किसी का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या हैं उसकी नजर में,और उसका व्यवहार निर्भर होता है उसके स्वभाव पर ,और उसका स्वभाव निर्भर होता है दूसरों के उसके प्रति जैसे विचार होते हैं .यानि सभी कुछ एक दूसरे पर कुछ इस तरह निर्भर होता है जैसे अंडा पहले या मुर्गी .क्योंकि हर कार्य का कोई कारण होता है और इस तरह एक जन्जीर सी बनी चली आती है.पर अगर हम दूसरों के द्वारा अपने बारे में की गई निंदा या प्रशंसा से अलग रहते हैं तो स्वयं को इस जंजीर से अलग कर लेते हैं फिर कार्य और कारण का हमारे उपर कोई असर नही होता .

Tuesday, 29 March, 2011

क्या समझा

क्या समझा -द गुरु ऑफ जॉय -से
जीवन का उद्देश्य समझा .उद्देश्य है परहित के लिये काम करते रहना .अगर मैने बहुत सारा धन कमा लिया तो उससे क्या होगा ?किसी की तुलना में तो कम ही होगा.अगर मुझे कोई बहुत बड़ा पद मिल गया तो उससे क्या होगा.किसी की तुलना में तो कम ही होगा .यानि जीवन में कुछ भी पा लो ,किसी की तुलना में तो कम ही होगा .
तो क्या बहुत सारा धन पा लेने या बहुत बड़ी पदवी पाने को जीवन में सफल होना कह सकते हैं .
पर अगर मैने किसी को निःस्वार्थ भाव से कुछ खाने को दिया या कुछ भी किया तो उसकी कोई तुलना नही होती किसी से .देते रहना, करते रहना यही जिंदगी है ,अगर इसे निकाल दो जिंदगी से तो बचा क्या?बस खाना पीना और सो जाना.
खुशी तो तब मिलती है जब हम प्यार से किसी को कुछ खिलातें हैं ,कुछ उपहार देते हैं,या दूसरा हमे कुछ देता है या हमारे लिये कुछ करता हैं .
हम दूसरों के लिये करें और दूसरे हमारे लिये करें ,यही जिंदगी है. बस यही समझा मैने .

Saturday, 19 March, 2011

Be happy

सब चाहते हैं खुश होना पर वही खुश रह पाता है जिसे इसका फार्मूला पता हो और फार्मूला बिलकुल साधारण है .
हमे सिर्फ इतना करना है कि हम अपनी किसी भी जिम्मेदारी को बोझ न समझें ,क्योंकि जब तक हमारी आवश्यक्तायें हैं जिम्मेदारी तो रहेगी ही. जैसे कि आप सबने सुना होगा कि एक छोटी सी बच्ची अपने नन्हे से भाई को उठा कर चल रही थी तो किसी ने कहा कि इसे उतार दो तुम थक जाओगी ,तो उसने जवाब दिया कि नही थकूंगी,ये मेरा भाई है. इसका मतलब हुआ कि जब हम प्रेम के वशीभूत होकर कोई जिम्मेदारी वहन करते हैं तो हमे बोझ नही लगतींपर ऐसा तो तभी हो सकता है जब हम अपने पराये का भेदभाव छोड़ दें .होली का त्यौहार यही सन्देश लेकर तो आता है कि सभी को अपने रंग में रंग लो, सबके साथ एक हो जाओ,रंग भले ही अलग अलग हो पर सब अपनी अपनी पहचान भूल कर एक से रंग बिरंगे हो जायें.पर हम बेहिचक उसीके रंग में रंगने को तैयार होते हैं जहाँ हमारा भरोसा होता है कि गलत रंग नही लगाया जायेगा.इंसान पर भरोसा नहीं हो सकता पर ईश्वर पर तो हो सकता है न. नही होता तो शुरु प्रार्थना से करो ,प्रार्थना मांगने के लिये नहीं ,जो कुछ उसने दिया उसके लिये उसे धन्यवाद देने के लिये करो.और ऐसा तभी कर पाएंगे जब थोड़ी देर मौन में बैठेगें ,चुप होकर बैठेगें.

Saturday, 12 March, 2011

सब हो रहा है

मालूम तो है कि सब अपने आप ही हो रहा है पर कामनाओं को पूरा करने के लिये मन फिर भी प्लानिंग तो करता ही है न.पर पिछले दिनों की हाल ही में हुई ऐसी कितनी ही घटनाएँ हैं जिनसे पता चलता है कि मैने जो भी किया है उसमे प्लानिंग का कोई मतलब नहीं था मुझे अवसर मिलता गया और मै करती गयी .जैसे २६ फरवरी को नए मल्टीप्लेक्स में सात खून माफ मूवी देखना ,फिर २८ को आनन्द स्पा में लंच करना ,४ मार्च को पार्लर से थ्रेडिंग करवाना ,५ मार्च को मधुबन होटल जाकर ज्यूलरी सेट खरीदना.और उसी दिन जट यमला , पगला
, दीवाना मूवी देखना ,वो भी ६ से ९ के शो में .सात और आठ को मेहमान नवाजी का अवसर भी मिला.सुबह ६ बजे अमेरिका की एक प्रियजन से स्काइप पर वीडियो काल भी हुई .लगभग रोज ही कुछ न कुछ ऐसा हुआ है जिसका दूर तक भी कोई ख्याल तक न था.
तो फिर प्लानिंग की जरूरत ही क्या है.असल में बात जरूरत की नहीं है.प्लानिंग करना भी तो सब हो रहा है के अंदर ही आता है.दिमाग का काम टेक्निकल बातों को सोचना है ,दिमाग है ही इसीलिये.ये सारे अवसर हमे मिल रहे हैं पर इनको हैण्डल करते समय दिमाग का यूज तो होता ही है ,जैसे कि पिक्चर देखने जाना है तो किस तरह से तैयार होना है , घर को बंद करना है.किस तरह से बैठना है थियेटर की सीट पर. मेहमानों का स्वागत कैसे करना है ,फोन पर बात कैसे करनी है.हमे मिलने वाले हर अवसर में बहुत से टेक्निकल काम जुड़े हुए हैं ,इस लियेमन को कामनाओं की प्लानिंग से मुक्त करो और देखो कि कौन कौन से अवसर मिल रहे हैं और मै उसको कैसे हैन्डल कर रही हूँ .कामना मुक्त रहने से हमारा दिल स्वाभाविक तौर पर खुश रहता है.

Tuesday, 1 March, 2011

हम सब एक ही हैं

सभी लोग यह बात तो जानते हैं कि हम जैसा बीज बोयेंगे वैसा ही फल मिलेगा.पर यह नहीं जानते कि जब हम किसी के बारे में मन में कुछ सोच रहे होते हैं अच्छा या बुरा ,तो वैसी धारणा उस व्यक्ति तक पहुँच ही जाती है ,मन मे किसी के लिये कुछ भी सोचना बीज डालना ही है. लोग कहते हैं कि हमने तो उसके साथ इतना अच्छा व्यवहार किया पर उसने बदले में क्या दिया.ऐसा इसलिए कि आप ने ऊपर से तो अच्छा व्यवहार दिखाया पर आपके अंदर उसके लिये कुछ अलग ही चल रहा था.जरूर कुछ कारण रहे होंगे कि अंदर कुछ और बाहर कुछ व्यवहार दिखाना पड़ा होगा.क्योंकि यह सिलसिला तो बहुत पुराना चला आ रहा है,पर अब जब हम जान गये हैं कि आम का बीज बोने पर आम ही फलता है और बबूल का बीज बोने पर बबूल ही फलता है, भले ही हमें किसी ने बीज डालते समय देखा न हो .फल बता देगा कि क्या बोया गया था. इसलिये हमे अपने भीतर सदभावना के बीज ही बोने हैं .हम सब ऊपर से अलग अलग दिखते हुए भी भीतर से जुड़े हुए हैं.