Sunday 22 May 2011

संसार को त्यागे नही ,त्याग से अपनायें

बात सही है कि संसार दुःख है पर सुख भी तो संसार से ही मिलता है.हमे संसार में ही तो भाई,बहिन, अड़ोसी ,पड़ोसी का सुख मिलता है.उनके साथ मेरेपन का भाव भी अपनेआप ही जुड़ जाता है .मेरा घर,मेरा बगीचा ,मेरा देश ,मेरा ब्लाग वगैरह- वगैरह भाव सुख देते हैं.
पर अगर ध्यान से देखें तो सुख सिर्फ तभी मिलता है जब हम इन सम्बन्धों में त्याग की भावना रखते हैं.अगर माँ,बाप अपने बच्चों का ख्याल न रखें तो माँ ,बाप किस बात के ,इसीतरह अगर बच्चे माँ ,बाप का ख्याल न रखें तो बच्चे किस बात के ?मेरा घर जिसे हम कहते हैं उसे सजाने सवांरने मे अपने आराम ,समय और धन का त्याग न करें तो मेरा घर कैसे सुख देगा. हर वह चीज जिसमे मेरा शब्द जुड़ा है उससे सुख पाने के लिये त्याग जरूरी है .अपने समय का त्याग,अपने आराम का त्याग ,अपने धन का त्याग .क्योंकि जिससे हमें कुछ मिलता है उसे हम कुछ न दें तो दोनों ही नही बचते .हर व्यक्ति को पेट भरने के लिये मेहनत करनी ही पडती है पर मेहनत करने की ताकत भी तो पेट से ही मिलती है .पेट सिर्फ अपने लिये ही तो नही खाता.खाना हजम करके हमे मेहनत करने लायक बनाता है.पर जैसे खाना तो हमे रोज पड़ता है ,इसीतरह रोज ही अपने सुखों केलिए कुछ त्याग करना पड़ता है.

1 comment:

  1. बहुत सुंदर और सौ प्रतिशत सत्य विचार ! तभी तो उपनिषदों में कहा है "तेन त्यक्तेन भुंजीथा'...

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