Wednesday 27 July 2011

कसौटी



हमारा भौतिक संसार परमात्मा का ही स्थूल रूप है.और इस संसार में हमारा जो आपसी व्यवहार है,हमारी जो इच्छायें,कामनायें हैं ,राग-द्वेष है ,वह सब स्वप्न के संसार से ज्यादा स्थाई नही है.जैसे स्वप्न में हम बेसिरपैर के अनुभव से गुजरते हैं ठीक वैसा ही जाग्रत अवस्था का संसार भी है क्योंकि असल में हम जाग्रत होते ही कहाँ हैं सिर्फ लगता है कि जगे हुए हैं.कुछ बनने के कुछ होने के नशे में डूबे हुए ही तो रहते हैं हम सब.सारी लड़ाईयां,सारे वाद-विवाद उसी कुछ होने के ,अपने को सिद्ध करने की आकांक्षा से ही तो उपजते हैं .जो व्यक्ति जगा हुआ है उसे पता है कि जो है सो है,कुछ और बनने की चेष्टा किसलिए ?
तो हर समय जाग्रत रहने के लिए मैने समय -समय पर कई सिद्धांतों का सहारा लिया.
पहला सिद्धांत जो याद आता है ,वह यह है कि -यह भी बीत जायेगा .यानि जब भी मन किसी समस्या से दो चार हुआ तो यह कह कर उसे सहारा दिया कि यह भी बीत जायेगा ,कोई भी समस्या हमेशा नही रहती ,परेशान होना छोड़ो और आगे बढ़ो .आगे तो बढ़ गई पर मन में यह आता रहा कि ऐसा कब होगा जब कोई समस्या आये ही न .
इसलिए दूसरा सिद्धांत लिया कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता .तो फिर सोचना क्या ?सारी समस्याओं का कारण और हल दोनों ईश्वर ही तो है .पर जिस तरह पहला सिद्धांत हमेशा मन को संतुष्ट नही रख सका उसी तरह सब कुछ ईश्वर को सौंप देने से भी बात नही बनी .कुछ सही न होने पर मन अपनी जिम्मेदारी ले लेता है और फिर परेशान होता है .तो फिर तीसरा सिद्धांत लिया कि पल -पल जियो ,पुराना अगला भूलो यानि भूत-भविष्य के चक्कर में न पड़ो,वर्तमान में रहो .
पर क्या आसान है इतना!मन तो पल में कहाँ-कहाँ दौड़ जाता है उसे वर्तमान में टिकाएँ कैसे .टिकना तो उसका स्वभाव ही नही है ,उसका धर्म ही नही है ,हमेशा गति में रहना ही तो उसका लक्षण है,-रुका और खत्म हुआ .तो वर्तमान में रहना ,पल -पल जीना भी इतना सरल नही है .
फिर चौथा सिद्धांत लिया -साक्षीभाव में रहो .मतलब जो भी सोचो.करो उसकी गवाह रहो जैसेकि अब मै यह सब इस लैपटॉप पर लिख रही हूँ तो यह तो लिखा हुआ एक दिन खत्म हो जायेगा ,लेपटोप भी नही रहेगा , ,पर मेरा वह स्वरूप तो हमेशा रहेगा जिसपर यह लिखपाने या न लिखपाने का खेल चल रहा है, जिसे पता है किएक समय ऐसा भी था कि जब लिखना आता ही नही था ,और आगे भविष्य में क्या कुछ लिखने वाली हूँ या सब कुछ भूल जाऊँगी.फिर भी जिसे यह पता है कि जो गवाह है ,साक्षी है ,वह तो हमेशा रहने वाली है .और यह सिद्धांत तो महा सिद्धांत निकला क्योकि जब हर समय साक्षी बन कर नजर रखी तो हरपल पर ध्यान तो स्वाभाविक होने लगा और जब हरपल पर ध्यान रहने लगा तो पाया कि सच ही तो ईश्वर की मर्जी के बिना कहाँ कुछ हो सकता है .जब इस बात को माना तो पाया कि पहला सिद्धन्त भी कसौटी पर खरा उतरता है कि यह भी बीत जायेगा क्योंकि हरपल बीतता हुआ ही नजर आ रहा है .
इसलिये हरसमय साक्षीभाव रखना है बस .ये है महामंत्र या महासिद्धांत ,कुछ भी नाम दे दूँ.

Sunday 24 July 2011

सबका धर्म एक -ओशो

ओशो के सत्संग में सुना कि धर्म तो एक ही है जैसे कि ईश्वर एक है पर नाम अलग अलग हैं.इसी तरह कोई जैन तो कोई बुद्ध तो कोई मुसलमान तो कोई ईसाई हो सकता है पर जरूरी नही कि वह धार्मिक भी हो.धार्मिक तो वही होता है जो धर्म का पालन करता है.हिंदू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई होने से ही कोई धार्मिक नही हो जाता .
जैसे स्वास्थ्य एक है पर बिमारियाँ अलग- अलग हैं .उसी तरह धर्म तो एक ही है.हिंदू मुस्लिम होने पर हम अलग अलग कर्मकांडों का पालन कर सकते हैं पर धार्मिक मनुष्यों के मन की स्तिथि एक जैसी होती है.जैसे शांत मनुष्य सब भीतर से एक सा ही महसूस करते हैं.अशांति के कारण अलग -अलग हो सकते हैं
तभी तो सत-चित्- आनंद एक ही है .खुशी विभिन्न तरीकों से मिल सकती है पर उससे मिलने वाला आनंद एक जैसा ही होता है.भीतर से सबका धर्म एक हैं.   

Sunday 17 July 2011

स्वस्थ यानि स्वयं में अस्थ

हम स्वस्थ कब होते हैं जब अपने में अस्थ होते हैं .वह इस तरह कि आमतौर पर हम या तो खाने के पदार्थों में अपने को उलझाये रखते हैं या पहनने की चीजों में या रहने की जगहों में यानि हर वक्त कुछ पाने की लालसा में रहते हैं,अपने में अस्थ कम ही होते हैं उसी के लिए ध्यान में बैठने की सलाह दी जाती है,कम से कम तब तो अपने में अस्थ होंगे हालाँकि वह भी बहुत मुश्किल होता है क्योंकि मन टिकता कहाँ है?
हम जब तक प्रकृति में उलझे रहेंगे तब तक स्वस्थ नही हो सकते और प्रकृति का ही दूसरा नाम माया है.यही है ईश्वर की शक्ति जो अपना काम बड़े चुपचाप ढंग से करती रहती है.पर हम चाहते हैं कि हमारे ढंग से करे.क्यों करे वह हमारे ढंग से.उसे हमे ही नही देखना है,अरबों की संख्या में हैं उसके बच्चे.वह चुपचाप उन्हें जन्म देते पालती पोसती रहती है और पुराना होने पर उन्हें बदलती रहती है.,हम खामखाह अपनी मर्जी बीच में लाते हैं .
सर्दी लग रही है .लगेगी ही.चादर ओढ़ लो ,धूप में बैठ जाओ.हीटर आन कर लो.गर्मी लग रही है,सूती कपड़े पहनो,ढीले पहनो.पंखा चला लो .नहो लो.प्रकृति हमे इतनी ठंड क्यों दे रही है .इतनी गर्मी क्यों दे रही है,अरे तभी तो पता चलता है कि बसंत ऋतु क्या होती है . गर्मी देती है तभी तो ठंडे पानी का सुख ले सकते हैं.ठंड देती है तभी तो बर्फ के खेलों का आनंद ले सकते हैं .उन सबसे परेशान होना छोड़ें, वे सब तो केवल शरीर पर ही असर डालते हैं,और उनको सह कर ही वह मजबूत बनता है ,तभी तो लोग जिम जाकर पसीना निकालते हैं .सर्दी गर्मी से अपने शरीर को मजबूत बनाएँ.हम शरीर से अलग रहकर शरीर का उपभोग करने वाले हैं न कि स्वयं शरीर हैं .इसलिए स्वस्थ होकर यानि अपने में बैठकर ध्यान से देखें कि यह शरीर हमे कैसे नचा रहा है.अब हम इसे नाच नचाएं यानि खुद इसके मालिक बनें .

Friday 1 July 2011

एक और सत्संग

नीरू माँ के सत्संग से मन में अपने आप ही चिंतन मनन शुरू हो जाता है.इस समय जो मन में चल रहा है लिखने की कोशिश करती हूँ.
मुझे इन पांचों इन्द्रियों से जो भी अनुभव करने को मिला अच्छा या बुरा ,जैसे खाने को स्वादिष्ट पदार्थ ,पहनने को कीमती वस्त्र ,सुनने को मधुर संगीत,देखने को मोहक दृश्य,सूंघने को सुंदर फूलों की खुशबू.या कहीं से प्रशंसा सुनने को मिली या गालियां सुनने को मिलीं .चोट लग गई या बीमारी आ गई .फटे पुराने कपड़े पहनने को मिले .झगड़े देखने को मिले.बदबूदार जगह रहने को मिले.तो यह सब मेरा कर्मफल ही है.
पर अगर इन सब अनुभवों के होने के समय मैने अपने मन की स्तिथि को ,भावना को अपने वश में रखा तो ये कर्मफल मुझे प्रभावित नही कर पायेंगें .जैसे हम बीमार पड़ते हैं तब दवा खानी पडती है ,तो चुपचाप खा ही लेते हैं,और फिर ठीक हो जाते हैं .वैसे ही कुछ अगर कभी अपशब्द रूपी गाली खानी पड़े तो चुपचाप खा ही लेनी बेहतर है,क्योंकि उससे आगेके लिए सम्बन्ध बेहतर होने के चांस ही अधिक होते हैं .
अच्छे अनुभवों को भी ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत नही है वरना उनके लिए और लालसा हो जायेगी ,लालसा से उनके बंधन में पड़ जायेंगें ,और बंधन तो बंधन ही होता है चाहे लोहे का हो या सोने का हो .क्योंकि यह सारी बातें,सारे सुख -दुःख हमारी पाँचों इन्द्रियों तक ही असरकारी होते हैं .हम स्वयं उनसे अलग हैं .