Wednesday 24 August 2011

साक्षीभाव

सुबह आँख खुलते ही ख्याल आया कि मैं देख रही हूँ अपनेआपको कि उठने में आलस आरहा है .मन में कुछ इसतरह से विचारप्रक्रिया चली कि उठो या न उठो ,मुझे तो कुछ फर्क नही पड़ता .मैं तो सम्पूर्ण हूँ जल्दी उठने या देर से उठने से मुझे तो कोई फर्क पड़ने वाला है नही पर तुम्हारा ही चेहरा लटक जायेगा कि आज भी ठीक से योगा नही कर पाई देर से उठनेकी वजह से .ठीकसे योगा करना शरीर को तन्दरुस्त रखने के लिए जरूरी है.शरीर अस्वस्थ रहा तो रोजमर्रा के काम ठीकसे नही हो पायेगें,तो भई मेरा काम तो देखना है ,मैं तो देख रही हूँ कि तुम उठने में आलस कर रही हो फिर परेशानी में पड़ोगी तो वह भी देख लूँगी और हंसी आयेगी तुमपर कि चाहती कुछ हो और करती कुछ हो.सर्दी,गर्मी बारिश, धूप-छाँव ,रोशनी-अँधेरा इन सबका प्रभाव तुम्हारे शरीर पर पड़ता है तो उसकेलिए क्या सावधानी करनी चाहिए सब पता है.मैं तो साक्षीभाव से देख रही हूँ .तुम्हे पूरी आजादी है सोई रहो देरतक ,मुझे क्या लेनादेना .और फिर मैं लेटी न रह सकी उठ ही गई.