Thursday 6 October 2011

सूर्पनखा


राम को पता है कि उन्हें रावण से युद्ध करना है ,सीता को छुड़ाना है.
रावण को पता है कि उसे भी युद्ध करना है ,उसे समझाने वाले सब हैं कि वह गलत कर रहा है पर वह समझना ही नही चाहता राम को युद्ध न करने के लिए कोई नही कहता ,उन्हें तो सब सहयोग देते हैं,सीता को छुडाने के लिए युद्ध तो करना ही पड़ेगा.इसलिये उन्होंने युद्ध किया और विजय प्राप्त की.सबका आशीर्वाद उनके साथ था.
रावण के साथ दिल से कोई भी नही था .
हमारा आपका जीवन किस तरह से अलग है ?हमारे साथ भी अन्याय होता है,पर हम राम नही हैं ,न ही हमारे साथ अन्याय करने वाला रावण है .
हम बस इतना जानते हैं कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है.तो क्या हम सूर्पनखा हैं .
लगता तो ऐसा ही है क्योंकि हम भी अपने मतलब के लिए लोगों से मीठी बातें करते हैं और जब मतलब पूरा नही होता तो अपना असली रूप दिखाते हैं.
जब सूर्पनखा अपने असली भयंकर रूप में आयी तभी लक्ष्मण ने उसके नाक कान काटे .(और वो अपने खिलाफ हुए इस अन्याय की शिकायत लेकर अपने भाई रावण के पास पहुंच गई.)
हम सब भी तो भीतर से भयंकर रूप वाले हैं,सामने -सामने मिठास से भरे हैं.राम बाहर भीतर एक से ही थे .

Monday 3 October 2011

श्रद्धा क्यों जरूरी है.

हमारी आँखे हैं इसलिये हमें जब दिखाई देता है कि सामने कांटे हैं तो हम बच कर निकलते हैं.असावधानीवश अगर कांटा चुभ भी जाये तो उसे निकाल देते हैं क्योंकि हमे दिख रहा है कि कहाँ चुभा है.पर जो अंधे हैं उन्हें तो कोई आंखवाला ही रास्ता दिखायेगा न .या उन्हें खास ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी कि किस तरह से कंटीले रास्तों से बच कर निकल सकते हैं.
और वैसेभी जिनकी आँखें हैं वह स्वाभाविक तौर पर उस व्यक्ति की मदद करने लग जाता है जिसे दिखाई नही पड़ रहा है.
इसीतरह आँखें शरीर की ही नही मन की भी होती हैं पर अधिकतर लोगों की आँखें बंद ही रहती हैं कुछ ही हैं जो अपनी आंखें खुली रखते हैं और उनकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि बाकी के मनुष्य भी अपनी बंद आँखों को खोलें ,साफ-साफ देखें कि कहाँ-कहाँ से उनके दिल में कांटे चुभ रहे हैं.कैसे उन काँटों से बचें और जो चुभ चुके हैं कैसे उन्हें निकालें .
इसीतरह सामने अगर हीरे पड़े हों तो अंधा तो उन्हें कंकड़ ही समझेगा न .आंखवाले पर श्रद्धा होगी तभी हीरे इकट्ठे करेगा महात्माओं की बातें हीरे की तरह मूल्यवान होती हैं पर मन के अंधे मनुष्य श्रद्धा न होने से उन्हें बकवास समझते हैं और भीतर से गरीब के गरीब ही बने रहते हैं.