Monday 15 November 2010

आत्मा का आनन्द

हमारी भूख प्यास ,सर्दी गर्मी प्रकृति के नियम हैं ,इनके हल उसी तरह निकलते रहते हैं जैसे कि पशु पक्षी इन सबका मुकाबला करते हैं.मनुष्य के पास दिमाग है इसलिए अगर वह पक्षियों के समान उड़ नहीं सकता तो उसने हवाई जहाज बना लिये,मछली की तरह तैर नहीं सकता तो नाव बना लीं पानी के जहाज बना लिये .चीते की तरह दौड़ नहीं सकता तो कारें बना लीं .बनाने मे भी आनंद आता है जब भी हम कुछ नया निर्माण करते हैं तो आनन्द होता है.मनुष्य के अंदर से ही नवनिर्माण के विचार आते रहते हैं और वह नवनिर्माण करता रहता है.और पुरानी वस्तुएं नष्ट होती रहती हैं.ये सब आत्मा की शक्ति से होता है.आत्मा डायरेक्ट तौर पर कुछ नहीं करती पर उसके होने से ही सब कुछ होता है.जैसे सूरज के होने से सब होता है.फूलों की खुशबू और कचरे की सड़ान्ध दोनों सूर्य के होने से ही होती हैं पर सूरज पर न तो खुशबू का कोई असर होता है न ही सड़ान्ध का .इसी तरह आत्मा की शक्ति से ही सब होता है अच्छा भी और बुरा भी. पर मेहनत तो इन्सान को करनी ही पड़ती है अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये.डायरेक्ट रूप से किसी भी भौतिक जरुरत को पूरा करने की मेहनत हमेशा दुखदायी होती है.मेहनत हमेशा ईश्वर के निमित्त बन कर करनी चाहिए.आवश्यकतायें ईश्वर ने ही दी हैं.वही पूरा करता है.और कर भी रहा है.हम अपनी जरूरतों को पूरा करने मे कुछ इस तरह उलझ जाते हैं जैसे कि जरूरतें हमारे लिये नहीं हैं हम उनके लिये हैं.और तब तो हमारे परिश्रम का कोई अंत ही नहीं है.पर अगर ईश्वर के निमित होकर करते हैं तो मेहनत में आनंद मिलता है ,थकावट मे भी आनंद मिलता है.

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