Monday 6 June 2011

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

कर्म करने में अधिकार है पर फल पाने में नही.मन ही मन इसको स्पष्ट करने की कोशिश की तो समझ में कुछ इस तरह से आया कि जैसे किचन में चाय बनाना तो हमारे अधिकार में है पर कैसे बनेगी ,पीने को मिलेगी या नही ,कुछ नही कह सकते क्योंकि चाय बनाने का सामान पत्ती,चीनी ,दूध भी तो चाहिये ,सामान जिस क्वालिटी का होगा ,चाय भी उसी क्वालिटी की होगी.बनने के बाद उसमे मक्खी गिर गई तो... .इसी तरह और सारे काम हैं,जो सिर्फ हमारे करने भर से पूरे नही होते.हम तो सिर्फ एक अंश तक उसमे सहयोगी होते हैं,कुदरत ही हमे उस काम के लिये प्रेरित करती है .
यहाँ हर किसी का मन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है.तभी तो भीड़ एकमन होकर अनशन कर पाती है.क्रांति कर पाती है.तो इसी तरह से हमारे मन पर भी साथ के मन का असर पड़ता है.जब बहुत सारे मन किसी मुसीबत में पड़ते हैं तो उस मुसीबत से छुटकारा दिलाने की पुकार से कोई संत या महात्मा जन्म ले लेता है और जब बहुत सारे मन घ्रणा करने लग जाते हें तो कोई दुष्ट या आतंकवादी जन्म ले लेता है.हमे इतना अधिकार तो है कि हम संत की साइड लें या दुष्ट की .और हमेशा ही ये दोनों हमारे अंदर रहते हैं ,हमे पूरी आजादी है कि किसे चुनें.उसके बाद तो रब ही मालिक है.

2 comments:

  1. सरल उदाहरण द्वारा गहन बात को समझाने का सफल प्रयास ! आभार !

    ReplyDelete