Sunday, 26 December, 2010

स्वामी शिवानंद जी की पुस्तक

स्वामी शिवानन्दजी की पुस्तक -मन- में पढ़ा कि वृत्तियाँ पांच तरह की होती हैं---
१ -मनोवृत्ति =आमलोगों में मनोवृत्ति का प्रभाव ज्यादा रहता है.मनोवृत्ति अन्नमयकोष से बनती है.कहते है न-कि जैसा खाए अन्न वैसा बने मन.जैसे कोई कहे कि अभी मेरा मन नहीं हो रहा इस काम को करने का ,तो ये तो हुआ उसकी मनोवृत्ति का काम .ऐसे लोगों को मूडी भी कहा जाता है.
२- बुद्धि वृत्ति =जोकि आमलोगों से ऊपर विवेकी मनुष्यों में होती है जोकि विज्ञानमय कोष से बनती है.और विज्ञान तर्क से बनता है.सो हम मनोवृत्ति से निकलने के लिये तर्क का सहारा लेते हैं.फिर हम मूड के हिसाब से काम नहीं करते,बुद्धि से काम लेते हैं.
३-सात्विक वृत्ति =बुद्धि से भी ऊपर उठ कर जब हम अपने साक्षी भाव में होते हैं ,देख रहे होते हैं कि आलस घेर रहा है और बुद्धि के कहने से आलस छोड़ दिया है.
४ -ब्रह्म वृत्ति =जब हम अपने को ब्रह्म रूप में देखने लगते हैं.
५ -ब्रह्मकाररस वृत्ति =जब हम अपने साथ साथ पूरे ब्रह्मांड को भी ब्रह्मरूप में देखने लगते हैं.फिर कैसा बंधन कैसी मुक्ति.वहाँ तक पहुंचना ही हमारा लक्ष्य है.

Monday, 20 December, 2010

ओशो का सत्संग

ओशो के सत्संग में सुना कि धर्म तो एक ही है ,जैसे भगवान एक ही है,पर नाम अलग अलग हैं.इसी तरह कोई बुद्ध,कोई जैन,कोई मुसलमान कोई क्रिश्चयन हो सकता है,पर जरूरी नहीं कि वह धार्मिक भी हो.धर्म को माननेवाला ही धार्मिक होता है.हिंदू,मुस्लिम सिख इसाई होने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता.जैसे स्वास्थ्य एक है पर बीमारियां अलग अलग हैं,उसी तरह धर्म एक ही है,हिन्दू मुस्लिम होने पर हम अलग अलग कर्मकांडों का पालन कर सकते हैं,पर धार्मिक मनुष्यों के मन की स्तिथि एक जैसी होती है.जैसे शांत मनुष्य सब भीतर से एक जैसा अनुभव करते हैं.अशांति के कारण अलग अलग हो सकते हैं.सो सत् चित आनंद एक ही है,खुशी अलग अलग तरीकों से मिल सकती है पर आनन्द एक जैसा ही होता है.

Sunday, 12 December, 2010

सही संस्कार

अगर हमारा मन कहीं उलझा हुआ है तो रोशनी होने पर भी आखें कुछ देखती नहीं हैं.नाक सूंघता नहीं है भले ही फूलों की खुशबू आ रही हो, कान सुनते नहीं हैं भले ही कोई हंस रहा हो ,रो रहा हो. जीभ को स्वाद की कोई अनुभूति नहीं होती.भले ही स्वादिष्ट खाना मुंह में जा रहा हो. त्वचा को स्पर्श का अनुभव नहीं होता भले ही रेशम से छुआ जा रहा हो.और मन उलझता कब है? जब उसे किसी से राग हो या द्वेष हो.तो पिछले हफ्ते मेरे दांत में दर्द हुआ मन उसमे उलझ गया.दर्द से तो द्वेष ही होगा, राग तो नहीं हो सकता.हाँ दर्द भले ही इस लिये हुआ था कि मिठाई से राग हो गया था. न न करते भी कुछ ज्यादा ही खा ली थी. तो अब मन को उलझन से तो निकालना था ना ताकि मै ठीक से खाने पीने देखने सुनने का आंनद ले सकूँ .उसकेलिए बुद्धि की जरुरत थी,बुद्धि ने फैसला दिया कि डेंटिस्ट के पास जाओ .पर हमारे संस्कार बुद्धि से भी बढ़ कर होते हैं ,उन्होंने बुद्धि को चुप करा दिया यह कहकर कि एलोपैथिक दवा के साइड इफेक्ट होते हैं ,नेट पर भी यही दिखा कि उससे लीवर खराब हो जाता है.दो चार दिन देख लो नमक के पानी से कुल्ला कर लो .वही सब करके एक हफ्ता निकाल दिया. पर दर्द तो गया नहीं,मन को चैन कैसे मिलता फिर बुद्धि की सुननी पड़ी ,डेंटिस्ट के पास गयी.और दवा मिल गयी.पर फिर पुराने संस्कार हावी हो गये .और दवा ले कर रख दी.नमक के गुनगुने पानी से कुल्ला करना शुरू कर दिया.दो दिन निकल गये,तीसरी रात दर्द बढ़ गया ,नींद आनी मुश्किल हो गयी.संस्कारों ने कहा, तुम आत्मा हो ,दर्द शरीर को हो रहा है तुम्हे नहीं.आत्मा से परमात्मा की याद आयी परमात्मा ने कहा जब शरीर अलग है तो दवा खाने से डरती क्यों हो अगर साइड इफेक्ट होंगे भी तो शरीर को ही तो होंगे. और फिर मैने दवा खा ली,आधे घंटे के अंदर चैन मिल गया ,नींद आ गयी.समझ में आगया कि सही संस्कारों का होना कितना आवश्यक है,वर्ना बुद्धि की भी नहीं चलती.

Sunday, 5 December, 2010

मैं आत्मा हूं

ब्रह्मकुमारी आश्रम के सत्संग में जो सुना और समझ में आया वह कुछ इसतरह से है.
हमारे मन में मुख्यतः चार तरह के विचार आते रहते हैं ,एक तो निगेटिव यानि नकारात्मक होता है,जैसे कि किसी के लिये नापसंदगी ,द्वेष.
दूसरा बेकार का होता है बेमतलब कुछ का कुछ सोचते रहते हैं.खयाली पुलाव पकाते रहते हैं.न तो बात का कोई सिर होता है न पैर .पर मन कहीं टिकता नहीं है अभी इस बारे मे सोचा तो दूसरे ही पल कुछ और सोचने लग गये,ज्यादा समय तो इसी में बेकार करते हैं .
तीसरे होते हैं जरूरी विचार ,जैसे कल ट्रेन पकड़नी है तो इस समय तक तैयार होना है या अभी नाश्ता बनाना है तो उसकी इस तरह तैयारी करनी है ,स्पष्टरूप से पता होता है कि इस समय यह करना है.
चौथा होता है भलाई का ,परोपकार का कि अपनी कामवाली को ये कपड़ा दे दें ,या मंदिर में इतने रूपये चढ़ा दें या इस संस्था को इतना चंदा दे दें .
इस बात को समझाते हुए बताया कि जैसे हमारे पास सौ रूपये हैं तो दस की तो जरूरत की सब्जी ले ली और पांच का मंदिर मे प्रसाद चढ़ा दिया .बीस कहीं गिर गये और बाकी के सत्तर रुपयों से कुछ ऐसी चीजें खरीद लीं जो कि बिलकुल बेकार निकलीं,और इस तरह अपनी जेब खाली कर ली.
इसी तरह हम अपनी सौ प्रतिशत शक्ति में जरा सी शक्ति जरूरी काम में लगाते हैं या किसी का भला करने में लगाते हैं .ज्यादा तो दूसरों की कमियां निकालने में या बेकार का सोचने में व्यर्थ कर देते हैं.
पर अगर हमे शक्ति का स्रोत मिल जाये तो , शक्ति आती है आत्मा से हमे याद रखना होगा कि मैं आत्मा हूँ ,इसकेलिए प्रेमलता बहन ने होमवर्क करने को कहा कि हमे हरेक घंटे में एक मिनट के लिये कहना होगा -मैं आत्मा हूँ ,मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ.