Sunday 17 July 2011

स्वस्थ यानि स्वयं में अस्थ

हम स्वस्थ कब होते हैं जब अपने में अस्थ होते हैं .वह इस तरह कि आमतौर पर हम या तो खाने के पदार्थों में अपने को उलझाये रखते हैं या पहनने की चीजों में या रहने की जगहों में यानि हर वक्त कुछ पाने की लालसा में रहते हैं,अपने में अस्थ कम ही होते हैं उसी के लिए ध्यान में बैठने की सलाह दी जाती है,कम से कम तब तो अपने में अस्थ होंगे हालाँकि वह भी बहुत मुश्किल होता है क्योंकि मन टिकता कहाँ है?
हम जब तक प्रकृति में उलझे रहेंगे तब तक स्वस्थ नही हो सकते और प्रकृति का ही दूसरा नाम माया है.यही है ईश्वर की शक्ति जो अपना काम बड़े चुपचाप ढंग से करती रहती है.पर हम चाहते हैं कि हमारे ढंग से करे.क्यों करे वह हमारे ढंग से.उसे हमे ही नही देखना है,अरबों की संख्या में हैं उसके बच्चे.वह चुपचाप उन्हें जन्म देते पालती पोसती रहती है और पुराना होने पर उन्हें बदलती रहती है.,हम खामखाह अपनी मर्जी बीच में लाते हैं .
सर्दी लग रही है .लगेगी ही.चादर ओढ़ लो ,धूप में बैठ जाओ.हीटर आन कर लो.गर्मी लग रही है,सूती कपड़े पहनो,ढीले पहनो.पंखा चला लो .नहो लो.प्रकृति हमे इतनी ठंड क्यों दे रही है .इतनी गर्मी क्यों दे रही है,अरे तभी तो पता चलता है कि बसंत ऋतु क्या होती है . गर्मी देती है तभी तो ठंडे पानी का सुख ले सकते हैं.ठंड देती है तभी तो बर्फ के खेलों का आनंद ले सकते हैं .उन सबसे परेशान होना छोड़ें, वे सब तो केवल शरीर पर ही असर डालते हैं,और उनको सह कर ही वह मजबूत बनता है ,तभी तो लोग जिम जाकर पसीना निकालते हैं .सर्दी गर्मी से अपने शरीर को मजबूत बनाएँ.हम शरीर से अलग रहकर शरीर का उपभोग करने वाले हैं न कि स्वयं शरीर हैं .इसलिए स्वस्थ होकर यानि अपने में बैठकर ध्यान से देखें कि यह शरीर हमे कैसे नचा रहा है.अब हम इसे नाच नचाएं यानि खुद इसके मालिक बनें .

1 comment:

  1. बहुत सुंदर और सार्थक पोस्ट ! प्रकृति माँ की तरह हमारी सेवा में लगी ही रहती है पर हम बिगड़े हुए बच्चे की तरह मुँह फुलाए रहते हैं, फिर पिता परमात्मा हमें रोग रूपी थप्पड़ लगा कर सही रास्ते पर लाता है...

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