Friday, 4 May, 2012

देवरहा बाबा जी का प्रासाद

बनारस में हम सब परिवार के सदस्य नाव से रामनगर का किला देख कर आरहे थे ,साथ वाली नाव से हमें देवरहा बाबाजी का बर्फी का प्रसाद मिला .किसी एक ने कहा ,पता नही कैसा प्रसाद है हम नही खायेंगे ,कम से कम एक सदस्य तो न खाए ताकि कुछ गड़बड़ हो तो बताने लायक कोई तो हो न.और उसी समय नाविक के हाथों से चप्पू पानी में गिर गया उठाने के लिए वह भी कूद गया .चप्पू आगे-आगे और नाविक पीछे पीछे ,पर चप्पू उसके हाथ नही लग रहा था. इतने में हवा से हमारी नाव हिचकोले खाने लगी तैरना किसी को आता नही था.जान जोखिम में थी.फिर किसी दूसरे ने कहा कि प्रसाद नही खाया न, अश्रद्धा का परिणाम है.और हम सबने फौरन प्रसाद खा लिया .जान तो वैसे भी जाती. उसी समय दूसरी नाव से भी मदद के लिए कोई कूदा नदी में, और चप्पू पकड़ कर हमारी नाव के नाविक को दे दिया तैरते हुए वह जल्दी ही नाव में चढ़ गया इससे पहले कि हमारी नाव उलटती उसने कंट्रोल कर लिया .और हम सही सलामत किनारे पहूँच गये.उस प्रसाद का स्वाद अभी भी याद है.

3 comments:

  1. जान बची तो लाखों पाए ! प्रसाद पाकर पहले नहीं खाना फिर खाने पर मजबूर होना... वाकई उसके खेल निराले हैं. बहुत रोचक पोस्ट ! आपकी यादों के खजाने में कई अनमोल मोती हैं.

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  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

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