Monday, April 30, 2012

राम जाने ,कौन थे वे लोग

सर्दियों की आधी रात का समय, दो बजे होंगे शायद.हम सब घर के सदस्य अपनी अपनी रजाइयों में दुबके हुए गहरी नींद में थे.दरवाजे पर थाप पड़ी.
हेड पोस्ट ऑफिस से जुड़ा हुआ था हमारा घर ,पापाजी पोस्टमास्टर थे.उन्होंने आवाज सुनकर दरवाजा खोला .अँधेरे में किसी ऊँची लम्बी आकृति ने कहा कि हमारी गाड़ी खराब हो गई है,रात रुकने के लिए जगह चाहिए .उसके हाथ में बंदूक भी थी.
पोस्ट ऑफिस कम्पाउंड के बाहर मेनगेट के सामने देखा तो लम्बे खुले हुए बालों के साथ और भी ऊँची कद काठी के लोग दिखे .एक नजर में लम्बे बालों से लगा कि लेडीज भी हैं साथ में . हल्का सा अंदेशा हुआ कि कहीं ये डाकू तो नही,पर वे तो सहायता मांग रहे थे .उनका इरादा पोस्ट ऑफिस लूटने का था या नही, कौन बता सकता है.
पापाजी ने कहा ,ठीक है इंतजाम हो जायगा और अंदर आकर हम सब भाई बहिनों को जगाया और अपने अपने बिस्तर खाली करने को कहा ,टोटल पांच लोग थे. . हमारे पास बड़े भाई का एक बिस्तर एक्स्ट्रा था . क्योंकि वह बाहर पढ़ रहे थे उन दिनों .हम सब आठ सदस्य तीन बिस्तरों में एक साथ सोते जागते रहे क्योंकि सब के मन में खलबली मच चुकी थी कि आखिर ये लोग हैं कौन ?
तब दादी जी भी हमारे साथ थी, वह वाहे गुरु का जप करती रहीं . और पापाजी रात भर उनके दरवाजे के बाहर चक्कर लगाते रहे थे.सुबह होते ही वे जग गए थे और चले गए. लम्बे बालों का राज खुला था उनके सरदार होने का पता चलने पर, उन्होंने आधी रात को बाल खोल लिए होंगे दिन भर बांधे रखकर, शायद रोज ही रात को खोलते हों.
अभी तक मेरे मन में ख्याल आता है कि क्या वे सचमुच डाकू ही थे पर पापाजी का सद्व्यवहार देख कर उन्होंने कुछ गड़बड़ नही की.

Friday, April 20, 2012

पैदल चलने की जिद और हमसफर का ड्राइविंग टेस्ट

आबुधाबी में सोहनी शेरटन होटल से हिल्टन होटल तक की दौड़ के बारे में अक्सर न्यूज पेपर में पढ़ती थी ,उसका मन हुआ कि वह भी दौड़ लगाये.और बिना अपना स्टेमना बनाये यानि बिना किसी प्रेक्टिस के एक दिन सुबह वह चल पड़ी घर से ,उसे अभी तक यह भी नही पता कि कितने किलोमीटर चली  होगी ,किसी तरह पहुंच तो गई.(अकेली नही थी साथ में पड़ोसन को ले गई थी.पर फर्क इतना था कि पड़ोसन सुबह की सैर पर पहले भी जाया करती थी,यानि उसे अभ्यास था चलने का.)वापिसी में टैक्सी कर ली थी.
दिन भर कुछ पता नही चला पर शाम होते -होते लगा कि शरीर में जरा भी हिम्मत नही है,लेट गई बिस्तर पर और उसके हमसफर को डाक्टर को घर बुलाना पड़ा.उसने शायद डीहाईडरेशन ,थकावट बताया और ताकत की दवा दे दी.
अगले दिन हमसफर को पोस्ट ऑफिस जाना था ,घर से ज्यादा दूर नही था बच्चे स्कूल गए थे सो घर में अकेले रहने से अच्छा लगा कि वह भी साथ चली जाये ,चली तो गयी पर वहाँ जब खड़ा होना पड़ा तो लगा कि हिम्मत टूट रही है, और वहीं सीड़ियों पर झटके से बैठ गई ,हमसफर का कहना है कि बैठी नही गिर गई ,किसी से पानी लिया और मुँह पर डाला दो चार घूँट पिया,जान आयी ,टैक्सी बुलाई गयी और घर पहुंचे .दिन भर आराम किया और ठीक हो गई .हमसफर ने कहा कि अब तो ड्राइविंग टेस्ट में पास होना ही होगा ताकि कार खरीद सकें,और सच में इस बार पास हो गए .

Sunday, March 11, 2012

सोहनी का महन्तनी से भक्तिन तक का सफर


गोल-मटोल शांत स्वभाव की थी इसलिये उसके मौसा -मौसी उसे मह्न्तनी कहते थे .
जब जरा बड़ी हुई तो सीधे सादे स्वभाव को देखते हुए मकान मालकिन ने कहा कि ये तो कोई देवी लगती है .
जब देखा गया कि लड़ने या झूठ बोलने या किसीसे नफरत कर सकने की हिम्मत ही नही है तो मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी सार्थक करते हुए उसे एक सहपाठिनी ने महात्मा गान्धी की चेली नाम दिया .
जब और बड़ी हुई तो साफ रंग और घुंघराले बालों को देखते हुए एक दूर की आंटी ने गोरी मेम कहा.
और अब जब लगभग सारे ही बाल सफेद होने को हैं तो छोटे भाई ने कहा कि जगद्गुरु कृपालु महाराज की बेटी जैसी लगती है.
तो लगा कि सच में महंतनी से भक्तिन तक का सफर पूरा हो गया जो बीज लेकर सोहनी इस दुनिया में आयी थी वह खिल गया.

Thursday, March 1, 2012

सोहनी की सबसे छोटी बहिन

सोहनी जब ११ साल की थी तो उसकी छोटी बहिन का जन्म हुआ था ,अस्पताल गई थी देखने तो सुना, नौ पोंड की हेल्दी बेबी ने जन्म लिया है.
घर भर की लाडली थी.उसे गोदी में खिलाने के लिए घर में बहुत सदस्य थे.
हमसब भाई-बहिनों की पढ़ाई की शुरुवात सरकारी प्राइमरी स्कूल से हुई थी पर उसे मिशनरी स्कूल में पढ़ने का मौका मिला.
अपनी बात पूरी करवा के रहती थी,एक उदाहरण है मेरे पास, हम बड़े लोग घरके पास लगनेवाले मेले में गए थे .घर आकर बताया किसी खास खिलौने के बारे में ,उसने जिद पकड़ ली कि अभी चाहिए और फिर उसे लेकर गए और खिलौना दिलवाया .
इसी जिद ने उसे डाक्टर बनाया .बचपन से ही कहती थी कि बड़ी होकर डॉक्टर बनेगी.पढ़ाई में तेज थी वजीफा मिलता था.जब मेरी शादी हुई तो आठ साल की थी,उसके बाद तो कभी कभार ही मिलना होता है

Tuesday, February 28, 2012

सोहनी के जमाने का लाईक ,शेयर , फाइन्ड फ्रेंडस और फोलोवर


बारहवीं क्लास की फेयरवेल पार्टी में सोहनी नही गयी क्योंकि उसे पार्टी ड्रेस चाहिए थी .घरेलू कपड़ों या स्कूल यूनिफार्म में जाना नही चाहती थी और उसे यह भी पता था कि इतनी जल्दी नई ड्रेस नही मिल सकती . उसने अपनी क्लास में कहा कि वह नही आएगी .
उससमय उसके पीछे की बेंच की लड़कियों में कुछ खुसर- पुसर हुई जिसका मतलब था कि फिर उमा भी नही आएगी कभी भी उमा से बात नही हुई थी पर सुनने में आया कि वह मुझे लाईक करती है ,मैं नही आऊँगी तो वह भी नही आएगी और सच में नही आयी.
उसकी क्लास टीचर का नाम मिस भट्टी था उन्होंने नोटिस लिया कि सोहनी दूसरी लड़कियों की तरह चटर -पटर नही करती है तो पूछा कि क्या मेरी कोई फ्रेंड नही है अगर ऐसा है तो आज से उन्हें अपनी फ्रेंड समझे. इस तरह उसे एक बार क्लास ६ में मिस भूटानी और क्लास १२ में मिस भट्टी टीचर ने सहेली बनाया.पर ऐसा कभी अवसर नही आया कि उन्होंने आपस में कुछ शेयर किया हो, हाँ, इससे सोहनी के आत्मविश्वास में फर्क तो जरूर पड़ा होगा.
उन दिनों राजेश खन्ना का जमाना था ,पर उसने कोई पिक्चर नही देखी थी . अपनी किताब पर न्यूज पेपर  या मैग्जीन से आकर्षक तस्वीरों वाले पेपर लेकर अपनी स्कूल की किताबों पर कवर के रूप में चढ़ाये थे ,संयोग से एक पुस्तक पर राजेश खन्ना की तस्वीर बनी हुई थी ,देखते ही क्लास में शोर मच गया कि सोहनी भी राजेश खन्ना की फॉलोवर हो गई'.  

Sunday, February 26, 2012

सोहनी का सबसे छोटा भाई



जब सोहनी कि शादी हुई तो उसका सबसे छोटा भाई बारह साल का था.
एक दो महीने का ही था कि उसे तेज बुखार हुआ डाक्टर से दवा लेकर दी गयी और शायद दवा के बाद पानी पिलाने में देर कर दी, दवा इतनी तेज थी कि उसकी जीभ पक गयी अब तो दूध पीना भी मुश्किल हो गया .निशान अभी भी उसकी जीभ पर है .
जब भी बड़ा भैया गोदी में उसे खिलाता तो कहता था बड़े होकर कलेक्टर बनेगा न.
वह सबसे ज्यादा मस्तमौला था.पहली क्लास में फेल होने पर सबको खुशी से बताता रहा कि मै तो फेल हो गया.तब पापाजी ने ऑफिस से आकर रोज उसे पढ़ाना शुरू किया. और फिर तो बढ़िया नम्बर लाने लगा .
हर जरा जरा सी बात पर वह इतना उत्साहित और रोमांचित हो जाता था कि सोहनी कहती थी लगता है वह दुनिया में पहली बार आया है.
उसका पसंदीदा खेल था कीर्तन करना.गली मोहल्ले के उत्सवों में भी वह जोश से हिस्सा लेता था.
उसकी पहली पोस्टिंग बैंक की तरफ से घर से दूर पहाड़ों पर हुई.एक बार तो उसका मन हुआ कि जॉब छोड़ दे .पर पापाजी ने हौसला दिया कि हिम्मत से काम लो, जॉब आसानी से नही मिला करतीं
और वाकई उसने हिम्मत से काम लिया.अब तो ओशो का सन्यासी बन गया है.

Friday, February 24, 2012

सोहनी का हवा को बुलाने का तरीका

जब वह दस.ग्यारह साल की थी तब उनके यहाँ बिजली का कनेक्शन लगा था .उससे पहले रोज अँधेरा होते ही लालटेन जलाये जाते थे .
पर उस समय उनके कमरे में पंखा नही था .इसलिये गर्मी के मौसम में सब आँगन में या छत पर चारपाई बिछाकर सोते थे, जब बहुत गर्मी लगती तो हवा को बुलाने के लिए इक्कीस पुर गिना करते जैसे सहारनपुर सीतापुर रामपुर ,इक्कीस पुरों के नाम याद करते करते कहीं से तो हवा का झोंका आ ही जाता था और तबतक हवा आये या न आये नींद तो आ ही जाती थी .