Friday 25 May 2012

ऐसे संयोग भी होते हैं

शादी के बाद सोहनी पहली बार जब अहमदाबाद रहने गई ट्रेन से हमसफर के साथ तो उसी डिब्बे में एक ब्रह्म कुमारी भी थी. उन्होंने ध्यान की महिमा बताई थी कि किस तरह धीरे धीरे अभ्यास करते हुए लगातार तीन घंटे एक ही आसन में सीधे बैठना सम्भव हो जाता है.और उस समय ट्रेन में पढ़ने के लिये उसने प्लेटफार्म से किताब खरीदी तो वह ओशो की कोई किताब थी.
अब संयोग ऐसा हुआ है कि वे देहरादून में रहते हैं रिटायरमेंट के बाद तो उसके घर  से कुछ ही दूरी पर   ब्रह्मकुमारी और ओशो दोनों के आश्रम हैं और वे समय समय पर दोनों ही जगह जाते रहते हैं. 

Friday 18 May 2012

सोहनी के बच्चे और भागमभाग डाक्टर के पास

सोहनी के बच्चे और भागमभाग डाक्टर के पास
बड़ी बेटी जब दो ढाई साल की थी तो उसका हाथ गर्म पानी से झुलस गया था.सुबह के समय नहाने के लिये पानी को पतीले में गर्म किया और बाल्टी के ठंडे पानी में मिक्स करने के लिये जैसे ही डालने लगी उसने अनजाने में हाथ आगे कर दिया .फौरन उसे लेकर उसके मामाजी के साथ डाक्टर के पास भागना पड़ा.
छोटी बेटी जब ग्यारह या बारह साल की थी तो रात सोने के समय उसकी आँख में कुछ चला गया , फौरन नूर होस्पिटल डाक्टर के पास भागना पड़ा.जो  उसकी बिल्डिंग के पास ही था.स्वयं  ही ले गई थी.
बड़ा बेटा अभी छह,सात महीने का ही था किअचानक उसने साँस रोक ली. शाम का समय था फौरन उसके नानाजी ने उसे इस तरह पकड़ा कि सिर नीचे की तरफ रहे और डाक्टर के पास भागे .डाक्टर उसी कम्पाउंड में ही था.इमरजेंसी सहायता मिल गई.बाद में सरकारी अस्पताल के काबिल डाक्टर से इलाज चला.नानाजी ने इलाज करवाया था.
छोटा बेटा दो साल का रहा होगा जब उसने नाक में मोती फंसा लिया ,प्राइवेट अस्पताल में ले गये .डाक्टर उसे अंदर ले गया हमारा जाना मना था वहाँ ,पांच दस मिनट में ले आया कि हमारे बस का नही है .फिर दूसरे क्लीनिक में ले गये वहाँ नम्बर ही नही आ रहा था फिर सरकारी अस्पताल ले गये वहाँ डाक्टर्स की मीटिंग चल रही थी पर इंतजार के सिवा हमारे पास कोई चारा ही नही था ,पन्द्रह बीस मिनट में सर्जन डाक्टर फ्री हुआ उसने उसको गोदी में लिया और हमारे सामने ही एक क्लिप जैसे औजार से सेकंड्स में मोती निकाल बाहर किया.हमारी जान में जान आयी.इस समय उसके छोटे ताऊजी साथ में थे.
उसे ही एक बार और इमरजेंसी में ले जाना पड़ा ,जब उसने चार साल की उमर में सीढ़ियों से कूद कर पैर के तलुवे में फ्रेक्चर कर लिया था.इस समय बड़े ताऊ जी साथ में थे.

Saturday 12 May 2012

सोहनी के माँ बनने की कहानी सोहनी की जुबानी

अब मैं दुबई में थी और दुबई आने के दसवें महीने ही एक बेटी की माँ बन गई थी.पर माँ बनना कोई आसान बात नही रही, तबियत बिगड़ गई थी क्योंकि एक दिन कुछ ज्यादा ही पैदल घूमना हो गया. एमरजेंसी में हॉस्पिटल भागना पड़ा तीन दिन एडमिट रही .डॉक्टर ने बेड रेस्ट बता दिया. घर आने पर देखभाल कौन करता ,हमसफर की ड्यूटी तो समुन्द्र मे रिग पर होती थी एक हफ्ते के बाद एक हफ्ते के लिये घर आते थे .तबियत बिगड़ने पर इन्होने तय किया कि मै मायके मे रहूँ तो तीन महीनों के लिये इन्होने मुझे इंडिया मे छोड़ दिया .मेरे मम्मी पापा तो चाहते थे कि डिलीवरी वहीं हो पर मुझे इंडिया के हास्पिटल्स मे जाने मे हिचक होती थी ,दुबई के सरकारी अस्पताल मे एडमिट हो चुकी थी और अनुभव बहुत अच्छा रहा था बिल्कुल फ्री और बेहतर इलाज ,घरके किसी सदस्य को वहाँ रहने या खाना पहुँचाने की भी जरूरत नही.अच्छा खाना, साफ कपड़े ,फ्रेन्डली सिस्टर्स और क्या चाहिए. तो मै जिद करके सातवें महीने वापिस दुबई पहुँच गई.सही समय पर मैने एक बेटी को जन्म दिया.तीसरे दिन ये घर ले आये थे हमारे स्वागत के लिए बेडरूम सजा हुआ था मेरे बिस्तर पर सुंदर सी  तीन डाल्स भी रखी हुई थीं ,जैसे इन्हें पता था कि मुझे और  तीन बार माँ  बनना है.या कि इस नन्ही सी जान के लिए तीन और साथी आने वाले हैं और आने वाले कुछ ही  वर्षों में  ऐसा हो भी गया.
मेरी सेहत परफेक्ट थी ,घर के नार्मल काम आते ही करने शुरू कर दिये . पर बच्चे को कैसे पालना है ये मुझे सिखाया एक पाकिस्तानी डाक्टर ने .हुआ यह कि पहले हफ्ते ही बेटी को फीवर हो गया डाक्टर के पास ले गई सबसे पहले उसने उसका कम्बल हटाने को कहा, बताया कि कम्बल की गर्मी तो उसे और ज्यादा परेशानी देगी. कैसे उसे एक पतली मलमल की चादर मे रैप करना है, करके सिखाया. उसकी नाल पक गई थी उसे जलाकर ठीक किया . दूध की बोतल को पानी मे कैसे उबाल कर साफ करना है बताया.मुझे तो मालूम ही नही था कि बोतल उबालनी भी होती है. पहली बात तो यही पूछी कि अभी से बोतल का दूध दे ही क्यों रही हूँ, मैने कहा कि क्योंकि मेरा दूध बहुत पतला पानी की तरह है तो एक बार तो सुनते ही डाक्टर को भी और सिस्टर को भी हंसी आ गई बोली कि क्या तुम गाय भैंस हो जो गाढ़ा दूध आएगा, अरे ,माँ का दूध पानी सा पतला ही होता है .बच्चे के हाजमे के लिए ऐसा ही दूध चाहिए,पूछा कि क्या मुझे घर मे कोई बताने वाला नही है तो मैने कहा कि मै तो अकेले ही रहती हूँ तो डाक्टर ने तसल्ली दी कि कोई बात नही जो भी पूछना हो उनसे पूछ सकती हूँ.ख़ैर जब तक बेटी दो महीने की हुई ,मेरी सासु माँ का वीसा भी लग गया और वह हमारे साथ रहने दुबई आ गयीं.

Friday 4 May 2012

देवरहा बाबा जी का प्रासाद

बनारस में हम सब परिवार के सदस्य नाव से रामनगर का किला देख कर आरहे थे ,साथ वाली नाव से हमें देवरहा बाबाजी का बर्फी का प्रसाद मिला .किसी एक ने कहा ,पता नही कैसा प्रसाद है हम नही खायेंगे ,कम से कम एक सदस्य तो न खाए ताकि कुछ गड़बड़ हो तो बताने लायक कोई तो हो न.और उसी समय नाविक के हाथों से चप्पू पानी में गिर गया उठाने के लिए वह भी कूद गया .चप्पू आगे-आगे और नाविक पीछे पीछे ,पर चप्पू उसके हाथ नही लग रहा था. इतने में हवा से हमारी नाव हिचकोले खाने लगी तैरना किसी को आता नही था.जान जोखिम में थी.फिर किसी दूसरे ने कहा कि प्रसाद नही खाया न, अश्रद्धा का परिणाम है.और हम सबने फौरन प्रसाद खा लिया .जान तो वैसे भी जाती. उसी समय दूसरी नाव से भी मदद के लिए कोई कूदा नदी में, और चप्पू पकड़ कर हमारी नाव के नाविक को दे दिया तैरते हुए वह जल्दी ही नाव में चढ़ गया इससे पहले कि हमारी नाव उलटती उसने कंट्रोल कर लिया .और हम सही सलामत किनारे पहूँच गये.उस प्रसाद का स्वाद अभी भी याद है.

Monday 30 April 2012

राम जाने ,कौन थे वे लोग

सर्दियों की आधी रात का समय, दो बजे होंगे शायद.हम सब घर के सदस्य अपनी अपनी रजाइयों में दुबके हुए गहरी नींद में थे.दरवाजे पर थाप पड़ी.
हेड पोस्ट ऑफिस से जुड़ा हुआ था हमारा घर ,पापाजी पोस्टमास्टर थे.उन्होंने आवाज सुनकर दरवाजा खोला .अँधेरे में किसी ऊँची लम्बी आकृति ने कहा कि हमारी गाड़ी खराब हो गई है,रात रुकने के लिए जगह चाहिए .उसके हाथ में बंदूक भी थी.
पोस्ट ऑफिस कम्पाउंड के बाहर मेनगेट के सामने देखा तो लम्बे खुले हुए बालों के साथ और भी ऊँची कद काठी के लोग दिखे .एक नजर में लम्बे बालों से लगा कि लेडीज भी हैं साथ में . हल्का सा अंदेशा हुआ कि कहीं ये डाकू तो नही,पर वे तो सहायता मांग रहे थे .उनका इरादा पोस्ट ऑफिस लूटने का था या नही, कौन बता सकता है.
पापाजी ने कहा ,ठीक है इंतजाम हो जायगा और अंदर आकर हम सब भाई बहिनों को जगाया और अपने अपने बिस्तर खाली करने को कहा ,टोटल पांच लोग थे. . हमारे पास बड़े भाई का एक बिस्तर एक्स्ट्रा था . क्योंकि वह बाहर पढ़ रहे थे उन दिनों .हम सब आठ सदस्य तीन बिस्तरों में एक साथ सोते जागते रहे क्योंकि सब के मन में खलबली मच चुकी थी कि आखिर ये लोग हैं कौन ?
तब दादी जी भी हमारे साथ थी, वह वाहे गुरु का जप करती रहीं . और पापाजी रात भर उनके दरवाजे के बाहर चक्कर लगाते रहे थे.सुबह होते ही वे जग गए थे और चले गए. लम्बे बालों का राज खुला था उनके सरदार होने का पता चलने पर, उन्होंने आधी रात को बाल खोल लिए होंगे दिन भर बांधे रखकर, शायद रोज ही रात को खोलते हों.
अभी तक मेरे मन में ख्याल आता है कि क्या वे सचमुच डाकू ही थे पर पापाजी का सद्व्यवहार देख कर उन्होंने कुछ गड़बड़ नही की.

Friday 20 April 2012

पैदल चलने की जिद और हमसफर का ड्राइविंग टेस्ट

आबुधाबी में सोहनी शेरटन होटल से हिल्टन होटल तक की दौड़ के बारे में अक्सर न्यूज पेपर में पढ़ती थी ,उसका मन हुआ कि वह भी दौड़ लगाये.और बिना अपना स्टेमना बनाये यानि बिना किसी प्रेक्टिस के एक दिन सुबह वह चल पड़ी घर से ,उसे अभी तक यह भी नही पता कि कितने किलोमीटर चली  होगी ,किसी तरह पहुंच तो गई.(अकेली नही थी साथ में पड़ोसन को ले गई थी.पर फर्क इतना था कि पड़ोसन सुबह की सैर पर पहले भी जाया करती थी,यानि उसे अभ्यास था चलने का.)वापिसी में टैक्सी कर ली थी.
दिन भर कुछ पता नही चला पर शाम होते -होते लगा कि शरीर में जरा भी हिम्मत नही है,लेट गई बिस्तर पर और उसके हमसफर को डाक्टर को घर बुलाना पड़ा.उसने शायद डीहाईडरेशन ,थकावट बताया और ताकत की दवा दे दी.
अगले दिन हमसफर को पोस्ट ऑफिस जाना था ,घर से ज्यादा दूर नही था बच्चे स्कूल गए थे सो घर में अकेले रहने से अच्छा लगा कि वह भी साथ चली जाये ,चली तो गयी पर वहाँ जब खड़ा होना पड़ा तो लगा कि हिम्मत टूट रही है, और वहीं सीड़ियों पर झटके से बैठ गई ,हमसफर का कहना है कि बैठी नही गिर गई ,किसी से पानी लिया और मुँह पर डाला दो चार घूँट पिया,जान आयी ,टैक्सी बुलाई गयी और घर पहुंचे .दिन भर आराम किया और ठीक हो गई .हमसफर ने कहा कि अब तो ड्राइविंग टेस्ट में पास होना ही होगा ताकि कार खरीद सकें,और सच में इस बार पास हो गए .

Sunday 11 March 2012

सोहनी का महन्तनी से भक्तिन तक का सफर


गोल-मटोल शांत स्वभाव की थी इसलिये उसके मौसा -मौसी उसे मह्न्तनी कहते थे .
जब जरा बड़ी हुई तो सीधे सादे स्वभाव को देखते हुए मकान मालकिन ने कहा कि ये तो कोई देवी लगती है .
जब देखा गया कि लड़ने या झूठ बोलने या किसीसे नफरत कर सकने की हिम्मत ही नही है तो मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी सार्थक करते हुए उसे एक सहपाठिनी ने महात्मा गान्धी की चेली नाम दिया .
जब और बड़ी हुई तो साफ रंग और घुंघराले बालों को देखते हुए एक दूर की आंटी ने गोरी मेम कहा.
और अब जब लगभग सारे ही बाल सफेद होने को हैं तो छोटे भाई ने कहा कि जगद्गुरु कृपालु महाराज की बेटी जैसी लगती है.
तो लगा कि सच में महंतनी से भक्तिन तक का सफर पूरा हो गया जो बीज लेकर सोहनी इस दुनिया में आयी थी वह खिल गया.