Tuesday 5 February 2013

सीधी सी बात है

हम क्यों जी रहें हैं?किसके पास है इसका जवाब?
जो भी जी रहा है वह किसी सुख की तलाश में है.सुख नजर आता है भौतिक सुविधाओं में.और साथ ही यह भी दिखता है कि जिनके पास भौतिक सुविधाएँ हैं उन्हें भी सुख की तलाश है आनन्दित वे भी नजर नही आते .क्योंकि अपना ही भरोसा नही है कि कब तक हैं फिर ये सारा तम-झाम सारी मेहनत किसलिए .
मन को अगर कुछ चुभता है तो तन को सुख देने वाली किसी चीज में कोई अर्थ नही दिखता.
पर इस मन की खुशी मे हमारी बुद्धि ही अड़ंगे डालती रहती है बुद्धि हमेशा ही कुछ न कुछ कहती रहती है कि ये तूने ठीक किया ये गलत किया , ऐसे करो वैसे करो .जिनकी बुद्धि ज्यादा तेज होती है उतना ज्यादा उसे उलझा देती है.कम बुद्धि वाला वैसे ही कुछ कर नही पाता और अगर बुद्धिबल से कोई अपने को खुश कर भी देता है तो उसका अभिमान उसे दूसरों से अलग -थलग कर देता है .अपने को वह कुछ समझने लगता है पर अलग- थलग पड़ते ही सब खाली -खाली लगने लगता है सब कुछ व्यर्थ सा लगने लगता है तो आखिर इंसान करे क्या ? एक ही प्रश्न बार बार सामने आता है कि हम जीते क्यों हैं?तो इसका उत्तर तो किसी की भी बुद्धि से पकड़ में नही आता ऐसे उत्तर बुद्धि की पकड़ के बाहर हैं.
बुद्धि इतना जरूर सोच सकती है कि अगर जीवन रसमय हो आनंद से भरा हो तो फिर कोई फर्क नही पड़ता कि उत्तर मिले या न मिले .दुःख में ही तो इंसान पूछता है कि आखिर हम हैं क्यों? सुख में तो और भी लम्बी उमर की कामना की जाती है .
तो अब बात यही रह जाती है कि हम अपने सुख को ,आनंद को टिकाएँ कैसे ?
हम देखते हैं कि सांसारिक रूप से कई तरह के कष्टों के आने के बावजूद भी कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं जो अपना आपा नही खोते -हमेशा अपना संतुलन बनाये रखते हैं और तमाम लोग उनका अनुसरण करते हैं उन जैसा होना चाहते हैं. वे गिनती के लोग हैं उन्हें मनुष्य नही ईश्वर का दर्जा दे दिया जाता है जैसे राम ,कृष्ण, बुद्ध ,ईसा ,गुरु नानक .पर क्या इन सब की तुलना आपस में की जा सकती है .ये सब एक दूसरे से भिन्न थे .इनका जीने का ढंग एक सा तो था नही सो अब और कोई राम -कृष्ण कैसे हो सकते है ?
हमारे जीवन की जैसी परिस्तिथि होती है उसी में हमे संतुलन बनाना होगा ताकि हम जीवन- धारा से अलग थलग न पड़ जायें .बुद्धि हमे दूर तक साथ नही देती क्योंकि बुद्धि का प्रकाश उसका अपना प्रकाश नही है इसलिये वह बहुत सीमित है. हमे प्रकाश के उस स्रोत तक पहुंचना होगा जिससे बुद्धि को प्रकाश मिलता है जब हम उस स्रोत तक जाते हैं तो पता चलता है कि हमसब तो उसके निमित्त हैं पूरा संसार उसके निमित्त है .हमे लगता है कि हम कुछ कर रहें हैं पर कहाँ ?हम तो निमित्त बनकर जी रहे हैं .
सीधी सीबात है -कोई मेरे लिये अनाज उगाता है ,कोई सब्जी उगाता है, कोई कपड़े बनाता है, कोई घर बनाता है. कोई दवा बनाता है ,कोई कार बनाता है. मेरे जीवित रहने के लिय कितनी सारी भौतिक सामग्री की जरूरत है ,क्या मैं अकेले सब बना सकती हूँ यहाँ हरेक एक दूसरे का निमित्त बनकर काम कर रहा है .और यह हरेक है कौन ?अगर उसमे से परमात्मा का प्रकाश निकल जाये तो बचा क्या ?यानि देखा जाये  तो परमात्मा ही परमात्मा के लिये कर रहा है. उसीने तो स्वयं एक को अनेक में तब्दील कर दिया है तो फिर अनेक परमात्मा दुःख क्यों प्राप्त करते हैं?
यही तो खेल है उसका जिस दिन दुःख निकल गया, संसार खत्म हो जायेगा जिसे पता चल गया कि संसार तो खेल है वह फिर दुखी नही होता ,आनंद में ही रहता है. ईश्वर के निमित्त होकर सब काम करता है .हरेक की स्तिथि के अनुसार हरेक के हिस्से में कुछ काम आते ही हैं सो अपना - अपना काम करो,औरआनंद मे रहो.

Monday 21 January 2013

जियो मगर प्रेम से

हम जो दिखते हैं क्या असल में बस वही हैं अगर हाँ तो हम जरूर -जरूर डिप्रेशन में पड़ने वोले हैं क्योंकि जब हम देखते हैं अपने को गौर से तो अपनी कमज़ोरियाँ अपनी विवशता नजर आती है. सबको पता है भगवान बुद्ध की कहानी कि उन्होंने घर छोड़ दिया था ,क्योंकि संसार दुःख के सिवा और है क्या.
महापुरुष और गुरुजन हमारे प्रकाश स्तम्भ हैं जो हमारे डिप्रेशन वाले अँधेरे को दूर भगाते हैं .गुरुजंन हमे हमारा परिचय कराते हैं हमारी मन की आँखों का आपरेशन करते हैं .तब हमे दिखता है कि हम शरीर ही नही हैं , यहाँ जो भी घट रहा है उसके पीछे कुछ है जो हमे दिखाई नही दे रहा, समझ में नही आ रहा और हम सोच में पड़े रहते हैं कि ऐसा क्यों.
लेकिन हर कोई चाहता है कि उसे कोई जादू की छड़ी मिल जाए जिससे छूमन्तर से उसके दुखदर्द गायब हों जाएँ तो उसके लिए इतनी हिम्मत तो करनी होगी कि हम इस संसार से थोड़ी देर के लिए बाहर चले जाएँ, बाहर जाने के लिए संसार से जो बाहर है उसे पकड़ना पड़ता है और वह है ईश्वर ,उसे हम देख नही सकते पर उसका आभास पा सकते हैं क्योंकि वह अपने प्रेम के द्वारा हमेशा ही हमारे साथ है. हम उसके बच्चे हैं ,वह हमारी रक्षा करता है .जब भी कोई तकलीफ आती है तो मदद किसी न किसी रूप में जरूर आती है. हम उसके लायक भी नही होते, उससे कही ज्यादा मदद आती है पर हमारा ध्यान उस के प्रति कृतज्ञ होने का नही होता वरना जो भी मिलता है उससे अधिक पाने में लगा होता है कभी उसकी दी नेमतों पर भी ध्यान दें. तो हम पायेगे कि हम उसके ऋणी हैं .
ईश्वर हमे अपनी इच्छानुसार जीने की पूरी आजादी देता है हम खुद ही अपने को मुश्किलों में डालते हैं तरह तरह की नासमझी भरी कामनाएं करके, फिर अपने को उन कामनाओं को पूरा करने में खपा देते हैं .वह हमे देखता रहता है और मुस्कराता है जैसे हम अपने बच्चों की शरारतों को देख कर कभी मुस्कराते हैं तो कभी चपत भी लगाते हैं उसी की भलाई के लिए.पर ईश्वर को तो चपत लगाने की जरूरत भी नही पड़ती क्योंकि उसने प्रकृति का सिस्टम ही ऐसा बनाया है कि गलत    सोचेंग और कष्ट पाएंगे पर जो भी है वह इस शरीर तक ही है. कष्ट में भी अगर हम अपने असली वजूद को याद रखें तो कष्ट से पार हो जायेंगे.अगर हम याद रख सकें कि ईश्वर हमे सदा प्रेम करता है तो हमे कोई कामना करने की जरूरत ही नही होगी.
पर अबतक की गयीं कामनाओ के फलस्वरूप हम जिस स्थान पर हैं जो कुछ करने की जिम्मेदारी मिली हैं उन्हे पूरा करें-मगर प्रेम से .

Wednesday 16 January 2013

मन की बड़बड़ाहट

आज सुबह पांच बजे ही आँख खुल गई और बिस्तर छोड़ दिया लग रहा था कि चार बजे होंगे पहले भी आँख खुलती थी पर अँधेरा देख कर लेटी रहती थी, आज सोचा कि पजल हल कर लूँ रुबिक वाली .हल करनी शुरू की तो मन में बड़बड़ाहट हो रही थी, हमेशा ही होती है. आज सोचा कि उसे कापी पर उतार दूँ .
सबसे पहले ख्याल आया कि पापाजी से कल शाम बात कर ली है उन्होंने बताया कि छोटा भाई आ चुका है दिल्ली शिलौंग से सो उसे फोन करना है.
बड़े भैया से भी कहूंगी कि हर संडे स्काईप पर आया करें , डाउन लोड तो कर लिया पर दिखते कभी नही.
छोटी बहिन के ब्लाग पर तो कल कमेन्ट लिख दिए थे ,अब अपना ब्लॉग डालना है ताकि वह भी कमेंट्स लिख सके.छोटा करके पब्लिश करूंगी, कल कितनी बार कोशिश की पर गड़बड़ हो रहा था .बेटा आएगा तो उससे पूछूंगी फोन पर क्या पूछ्ना ,ऐसी कोई बड़ी समस्या तो है नही .
इन्हें शेयर मार्किट में फिर से लॉस हो गया ,मुझे तो लगता है कि बंद ही कर देना चाहिए .
सबसे छोटे भाई को भी फोन करना है कल शाम भाभी से बात हुई थी कि स्काईप डाऊनलोड कर लें अब तक कर लिया होगा .
सबसे छोटी बहिन से भी बात हुई है पच्चीस को ,अब दो को अनन्या के बर्थडे पर विश करना है,तभी फिर से बात हो जायेगी .
आज अपनी साड़ी लेने बूटिक जाना है दूसरी देनी है तभी उससे पूछूंगी कि अपने बाल खुले कैसे रखूं बिना कटवाए, लम्बे होजाने से उड़ते रहते हैं.वहाँ पर पार्लर भी तो है न.
छोटी बेटी से आज बात होने की उम्मीद है ,पता चलेगा कि कल उसकी खुराना फैमिली से बात हुई कि नही .खाने के लिये क्या इंतजाम है .स्काईप ऑन करेगी तो घर के फोटो भी देख लेंगे, कल तो काम कर नही रहा था.
बड़ी बेटी से कल फोन पर एक सौ चौतीस की बात कर ली थी सोचा ही नही कि उससे कहूँ कि स्काईप ऑन कर ले उनका स्काईप ऑन होता है पर वे देखते ही नही कि हम बुला रहें हैं सो एस एम एस करके या फोन करके मैसेज देना होगा.
बेटे ओर बहू से आज दिन में बात होने के चांस हैं ,पूरा हफ्ता भर वैसे तो उनके टच में ही रहे.पर सोचती हूँ कि खा -मखाह ही रहे,वे अपनी लाइफ में मस्त हैं उन्हें मस्त ही रहने देना चाहिये .शनि ,इतवार को तो बात हो ही जाती है.
अब कल बेटे का स्काईप ऑन देखकर मैसेज लिख दिया ,उसने चेक ही नही किया तो शाम तक सोचती रही कि चक्कर क्या है, ऐसा भी क्या व्यस्त है .ख़ैर शाम सात के करीब बात हो गई ,बताया कि कल से ही ऑन रह गया था उसने देखा ही नही ,जरा सी बात थी और मै दिन भर सोचती रही सो इस चक्कर में ही क्यों पड़ना .हर इतवार को तो वह फोन करता ही है .
आज नाश्ते में तो फिर मेथी के पराठें बनेगें ही,दलिया आज भी नही बनाऊंगी .गजरैला तो है न अभी.सेवई पड़ी हैं फुलियाँ पड़ी है, मैकरोनी पड़ी हैं,पोहा पड़ा है ,छ्वारे, खजूर ,गज्जक और हेल्दी बिस्किट्स और तमाम तरह के खाद्य पदार्थ पड़े हैं.रोज के खाने में उनकी जगह कहाँ बनाऊं, तय करना है.
पहला नाश्ता तो दूध का ही होता है दूसरा इन सबका .मेरा मतलब है कि इन सब से किसी एक चीज का जैसे सेवई,या मैकरोनी या पोहा या उपमा या इडली या डोसा या बेसन का चीला ,कुछ भी डिफरेंट बनाना शुरु करूं .दूध में अभी तो गाजर डाल रही हूँ .मीठे के लिये गुड़ या खजूर डाल सकती हूँ.
पेट के दाहिने और कुछ फीलिंग सी हो रही है ,पता नही पथरी है कि क्या है. अक्सर कुछ महसूस होता है पर कोई तकलीफ तो है नही.
दो मिनट के लिये बड़बड़ाहट बंद हो गई थी पर फिरसे शुरू हो गई.बौद्धटेम्पल जाना है आज भी जा सकते हैं, नही तो कल सही ,वहाँ से घंटी लानी हैं ओम की . एक साथ चार लाने का विचार है एक तो भाभीजी को गिफ्ट करनी है, दूसरी छोटे भाई को ,तीसरी पापाजी को कर सकती हूँ लेकिन अगर मैं दे भी दूँ तो उसका करेंगे क्या, उम्मीद तो नही कि उससे ओम की ध्वनि निकालें .शोपीस की तरह पड़ी रहेगी फिर किसी को गिफ्ट दे सकते हैं. तो तीसरी मेरे पास भी रह सकती है. चौथी फिर जिसका भी नाम लिखा हो , उस तक पहुंच ही जायेगी .घर में गिफ्ट पड़े रहने चाहियें .
पड़ोस के घर में भी तो जाना है कुछ गिफ्ट लेकर ,उनका नया घर देखना है घर तो पुराना है पर उसका कायाकल्प करके नया बना दिया है उन्होंने ,उनसे अपने घर की सीलन का उपाय भी पूछना है .
पड़ोसन के घर भी जाना है,उन्हें कह भी चुके हैं कि संडे को आयेंगे ,उन्हें फोन के पचास रुपये देने हैं. पांच मिनट से मन चुप है अब लिखा हुआ पढ़ कर देखती हूँ ,फिर पजल हल करना शुरू कर दूँगी छह बजने को हैं ,दोनों गीजर भी ऑन करने हैं.

Saturday 17 November 2012

लापरवाही बहू की पर मुसीबत ससुरालवालों की

शादी को अभी दो महीने ही हुए थे और सोहनी फर वाला कार्डिगन पहन कर खाना पका रही थी .स्टोप की फ्लेम से कार्डिगन के बाजू के फर ने आग पकड़ ली जो तेजी से कंधे से होते हुए खुले बालों तक जा पहुंची और उसी तेजी से उसने कार्डिगन को उतार फेंका ,मोड़तोड़ कर आग बुझा दी. बस जरा से बाल ही झुलसे थे .कुछ सेकेंड्स साँस लेते हुए समझने में लगाये कि ये हुआ क्या आखिर .पतिदेव ऑफ़िस गये हुए थे और सासुमां घर के बगीचे में पड़ोसन से बतियाँ रही थीं.जब अंदर आयीं तो उन्हें पहले तो स्वेटर दिखाया, खुद भी तभी देखा कि कितना जला है और फिर बताया कि कैसे जला ,सुनते ही वह तो यह सोचकर घबरा गयीं कि खुदा ना खास्ता अगर सोहनी को सच मे आग से कुछ नुक्सान पहुंचा होता तो पुलिस तो उन्हें पूछ -पूछ कर तंग कर डालती.

Tuesday 19 June 2012

मुम्बई दर्शन

मुंबई दर्शन के समय सोहनी और उसका हमसफर जुहू बीच गये थे , बैंच पर बैठकर ऊपर और ऊपर उठती हुई लहरों को देखने लगे जो कि आसपास के लोगों को भिगो रही थीं अपनी बौछारों से.वे जरा सी दूरी पर थे, दो विदेशी पर्यटक फोटोग्राफी कर रहे   थे .उन्हे समुन्दर के नजदीक जाकर फोटो शूट करने की कोशिश करते हुए देखा तो सोहनी ने कहा कि अभी पानी की लहर आयेगी और इन्हें पूरा नहला देगी .इतना कहना भर था कि ऐसी जोरदार लहर उठी कि बैंच तक आकर उन दोनों को नहलाते हुए वापिस चली गई ,लहरों की इस शरारत पर वे खिलखिला उठे तो दोनों पर्यटकों का ध्यान उनकी तरफ गया और वे पास आकर बोले- क्या वे उनके साथ अपनी फोटो शूट कर सकते हैं साथ ही कहा कि फोटो बन जाने पर वे उसकी एक -एक कापी उनके पते पर पोस्ट भी कर देंगे. सोहनी लोग भला क्यों मना करते, बिना कोशिश उन्हें एक यादगार मिलने जा रही थी. उन पर्यटकों ने फौरन उनकी फोटो ली और वायदे के मुताबिक उनके अहमदाबाद के पते पर पोस्ट भी कर दीं .वे दो फोटो भीगे हुए बालों और कपड़ों वाली उनकी पहली रंगीन फोटो थी जो अभी तक सोहनी ने सम्भाल कर रखी है. 

Friday 8 June 2012

ऐसा भी होता है -पार्ट २

जब भी सोहनी बच्चों का चकरी वाला झूला देखती है तो याद आ जाते हैं उसे वो पल जब वह भी बच्चों को लेकर झूले में बैठी थी और सबसे ऊंचाई पर पहुँच कर झूला रुक गया था, कुछ खराबी आ गई थी उसमे ,गोदी में दो साल का बेटा और साथ में दो नन्ही बेटियाँ .दिल धड़कने लगा ,कहीं कोई बच्चा हाथ की पकड़ से छूट न जाये .जल्दी ही खराबी ठीक कर ली गई और वे सब नीचे आ गये.साँस में साँस आई. पर वह दिन और आज का दिन... अभी तक उसने हिम्मत नही की कि फिर  कभी उस तरह के झूले का आनंद लिया जाये. पर दोनों बेटियों पर असर ये हुआ कि उन्हें जरा भी डर नही लगता ऊंचाई से. बंगी जम्पिंग हो या रॉक क्लाईमिंग ,सब करने को तैयार रहती हैं वे दोनों.

Wednesday 30 May 2012

ऐसा भी होता है

शादी के पहले साल ही सोहनी के हमसफर ने दुबई की जॉब के लिये एप्लाई किया था. इंटरव्यू के लिये मुम्बई जाने लगे तो वह भी मुम्बई दर्शन के लिये साथ चली गई .दादर स्टेशन पर वे उतरे थे .उसे सामान के साथ प्लेटफार्म के बेंच पर बैठने को कहा.उन्हें दूर के किसी रिश्तेदार के घर ठहरना था ,फोन करने के  लिये हमसफर कहीं चला गया .तभी दो लडकियाँ उसके पास आकर पूछने लगीं कि कहाँ जाना है ,कहाँ ठहरोगी .उन्हें लगा कि वह घर से भाग कर मुम्बई आयी है ,किसी होटल का पता बताने लगीं जहाँ वे दोनों ठहरी थीं पर तभी उसका हमसफर आ गया ,जैसे ही पता चला कि अकेली नही है तो एकदम से नौ दो ग्यारह हो गयीं .