Friday, April 20, 2018

परिवर्तन


कुछ भी नही समाप्त होता बस रूप बदलता है .
पहले बच्चे बड़ों के हाथ पांव दबाते थे ,
अब वे उन्हें मसाज चेयर पर बैठा देते हैं .
पहले उनके लिए भोजन पकाते थे ,
अब आर्डर देकर बाहर से मंगाते हैं  .
यानि बड़ों की सेवा पहले भी करते थे ,
अब भी करते हैं ,भावनायें वहीं हैं .
पर परिस्थिति ने रूप बदल दिया है.

Wednesday, April 18, 2018

हरियाली


मैने देखा जोलीग्रांट  एयरपोर्ट जाते समय कि किस तरह जंगल की तरफ बंदूक का निशाना लगाये पहरेदार  बैठा था ऊंची इमारत पर ,जंगल का हरा  भरा नजारा  मुझे बहुत अच्छा लगा पर अगले ही पल समझ में आया कि शायद ऐसा लगाव इस पहरेदार को रहा होगा पिछ्ले जन्म  में सो अब लगातार उसे इस हरियाली को देखते रहना है तो क्या अब भी उसे आनन्द मिलता होगा .
कोई भी सुख जो हमारी इन्द्रियों के लिए  है ,ज्यादा देर तक सुख नही दे सकता तो फिर ऐसे सुख की लालसा ही क्यों की जाये ,वो तो बंधन हो जाएगा.
तो फिर चाहिए क्या,मकसद क्या है इस जीवन का ,कुछ भी नही चाहिए तो ज़िंदा क्यों हैं ,मकसद है अपने स्वरूप को पाना ,हमारा स्वरूप आनन्द ही है ,ऐसा आनन्द किसी का मोहताज नही है और उसको पाने की कीमत है हम स्वयं ,खुद को खोकर ही वो मिलता है. 

Monday, April 9, 2018

कर्ता हम नही हैं

देवदास जी के साथ नरेंद्र स्वामी जी से मिलने ओशो आश्रम चले गए.उनसे सवाल किया गया कि हम कर्ता नही हैं तो फिर कर्मों का फल हमे कैसे मिलता है .स्वामीजी ने बताया कि अभी हम इस ज्ञान तक पहुंचे ही कहाँ हैं कि हम कर्ता नही हैं.ध्यान करो पहले ,जब अंदर से अनुभव में आजायेगा कि हम कर्ता नही हैं तो कर्मों के फल की बात भी खत्म हो जायेगी.
आज के सत्संग में फिर से सुना कि मै कर्ता नही हूँ,उदाहरण के रूप में बताया कि हम कभी गुस्सा कर बैठते हैं और बाद में सोचने लगते हैं कि ऐसा कैसे हो गया.मै तो  गुस्सा करती नही हूँ फिर मुझे गुस्सा कैसे आ गया.उससे पता चलता है कि हम कर्ता है ही नही ,कर्ता ने गुस्सा प्रकट करना था ,कर दिया ,ऐसा ही उदाहरण पहले योगानन्द जी की आत्म कथा  में पढ़ चुकी हूँ.आज का पूरा दिन इसी भाव को लेकर चलूंगी ,अनुभव  भी यही कहता है कि हम कर्ता नही हैं .

Saturday, April 7, 2018

सन्यास


सत्संग सुना ,एक प्रश्नोत्तर याद रह गया कि सन्यास का मतलब क्या होता है ,तो गुरूजी ने बताया कि व्यास के साथ ...व्यास के माने एक बिंदु ...एक परिधि ...एक केंद्र जिसकी  सब ओर समान निगाहे हों यानि जो सबके लिए समभाग  रखता है ,उसक लिए ऊँच, नीच ,छोटा, बड़ा कुछ नही है ,सन्यासी के लिए सब बराबर होते हैं ,तो मुझे भी तो आजकल कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है .

Thursday, April 5, 2018

तेज गुरु का सत्संग


 तेज गुरु का सत्संग सुना ..बता रहे थे कि जैसे तुम किसी दीवार का सहारा लेकर खड़े होते हो या आरामकुर्सी पर बैठ कर आराम करते हो,तो पूरी तरह से निश्चिंत होते हो कि दीवार नही गिरेगी,कुर्सी नही टूटेगी,और इस भरोसे के साथ  पूरी  तरह रिलेक्स महसूस करते हो,उसी तरह का भरोसा ईश्वर पर होना चाहिए.
बस ,ट्रेन  में सफर करते समय अपना सामान हाथ में रखने के बजाय वहाँ रख देते हो. उसी तरह अपने मन की चिताओं का वजन ईश्वर पर छोड़ो और निश्चिंत रहो.दिन भर, यही ख्याल बना रहा.

Wednesday, April 4, 2018

आत्मा


आत्मा सब जानती है उसे पता है कि मरीज कब ठीक होगा मौसम कब सुहावना होगा.
 उसे मरीज की मम्मी के नानू  का भविष्य भी पता है कि कब तक उनका साथ रहेगा ,मामू की कम्पनी कितनी तरक्की करेगी .मामू इंडिया में सैटल होंगे या विदेश में ही. मौसी  का नया घर कब तक बनेगा .
आत्मा ही तो है जिसे भूत भविष्य सब पता है और वो आत्मा हरेक के भीतर है ,हम अपने अंदर आत्मा को महसूस  करने का प्रयत्न करते हैं ताकि हमे भी सब दिख जाये पर मुश्किल यहाँ ये है कि आत्मा का कोई रिश्ता नही होता ,मामू ,मौसी ,नानू  चाचू ,बुआ ,दादू कुछ नही होता , सब रिश्ते उस व्यक्ति के होते है, व्यक्ति गया रिश्ता गया .
आत्मा के होने का अहसास हमे एक तसल्ली देता है कि सब रिश्ते टम्परेरी  है ,जो कुछ उनके जीवन में होना है होकर ही रहना है हम पहले से जान कर  क्या करेंगे ,पिक्चर चलने दो, एंड को पहले क्यों देखते हो.तुम्हारा असली स्वरूप तो आत्मा ही है ,जो हमेशा से थी ,हमेशा रहेगी ,उसकी छाया में  रहो ,आनन्द की वर्षा  होती  रहेगी. 

Monday, April 2, 2018

काली फीकी चाय

सोहम सोहम  जपते जपते जबसे ये पता चला है कि ईश्वर और कोई नही हम खुद ही हैं ,तब से मुश्किल हो गयी है अब जो भी करती हूँ उसके लिए ऐसा नही कह सकती कि ईश्वर ने ऐसा क्यों किया ,क्योंकि ईश्वर मै खुद ही हूँ.
चाय के साथ दही खाई ,चाय दो बार पी ली तो अब ये तो नही कह सकते कि ईश्वर की मर्जी ,मर्जी तो खुद की थी ,खुदा की नही ,खुद ही तो ईश्वर हूँ पर ईश्वर इतना कमजोर कैसे जो अपने खाने पीने की आदतों में भी सुधार नही कर सकता . अगर कहूँ कि वो तो गीता है ,उसका अहंकार ,उसकी इगो है तो ईश्वर कहाँ छुपा हुआ है उसे कौन सामने लायेगा उसे तो भूख प्यास भी नही लगती.

क्योंकि असल में तो वो सिर्फ देखता और जानता है ,करता कुछ नही ,उसने देखा कि दही के साथ चाय पी जा रही है और वो जान गयी कि ऐसा है ,अब गीता जगी हुई थी इसलिए वो भी देख पाई ,जान पाई ,अब गीता की मर्जी है जैसा चाहे करे आजादी है उसको ,पर असल में गीता की सत्ता मिथ्या है ,अभी है और अभी नही हो जायेगी उसकी असल सत्ता तो बिना रूप और नाम की है ,उसे चाय से कोई मतलब नही ,दही से कोई मतलब नही .तो गीता क्या करे ,गीता बस जागी रहे ,जगने से उसे दिख जाता है कि चाय के साथ दही नही चलती और सच में वो जग गयी अब वो चाय पीती है पर खालिस  चाय ,दूध ,चीनी भी नही डालती,ऐसी चाय नुकसान नही करती ,ऐसा उसने पढ़ा ,सुना है और  ऐसा करके उसे ठीक लग रहा है.