Wednesday, April 18, 2018

हरियाली


मैने देखा जोलीग्रांट  एयरपोर्ट जाते समय कि किस तरह जंगल की तरफ बंदूक का निशाना लगाये पहरेदार  बैठा था ऊंची इमारत पर ,जंगल का हरा  भरा नजारा  मुझे बहुत अच्छा लगा पर अगले ही पल समझ में आया कि शायद ऐसा लगाव इस पहरेदार को रहा होगा पिछ्ले जन्म  में सो अब लगातार उसे इस हरियाली को देखते रहना है तो क्या अब भी उसे आनन्द मिलता होगा .
कोई भी सुख जो हमारी इन्द्रियों के लिए  है ,ज्यादा देर तक सुख नही दे सकता तो फिर ऐसे सुख की लालसा ही क्यों की जाये ,वो तो बंधन हो जाएगा.
तो फिर चाहिए क्या,मकसद क्या है इस जीवन का ,कुछ भी नही चाहिए तो ज़िंदा क्यों हैं ,मकसद है अपने स्वरूप को पाना ,हमारा स्वरूप आनन्द ही है ,ऐसा आनन्द किसी का मोहताज नही है और उसको पाने की कीमत है हम स्वयं ,खुद को खोकर ही वो मिलता है. 

1 comment:

  1. सुंदर बोध देती पंक्तियाँ..जो आनंद किसी बाहरी वस्तु पर नहीं टिका है वही अपना है..

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