Sunday 26 December 2010

स्वामी शिवानंद जी की पुस्तक

स्वामी शिवानन्दजी की पुस्तक -मन- में पढ़ा कि वृत्तियाँ पांच तरह की होती हैं---
१ -मनोवृत्ति =आमलोगों में मनोवृत्ति का प्रभाव ज्यादा रहता है.मनोवृत्ति अन्नमयकोष से बनती है.कहते है न-कि जैसा खाए अन्न वैसा बने मन.जैसे कोई कहे कि अभी मेरा मन नहीं हो रहा इस काम को करने का ,तो ये तो हुआ उसकी मनोवृत्ति का काम .ऐसे लोगों को मूडी भी कहा जाता है.
२- बुद्धि वृत्ति =जोकि आमलोगों से ऊपर विवेकी मनुष्यों में होती है जोकि विज्ञानमय कोष से बनती है.और विज्ञान तर्क से बनता है.सो हम मनोवृत्ति से निकलने के लिये तर्क का सहारा लेते हैं.फिर हम मूड के हिसाब से काम नहीं करते,बुद्धि से काम लेते हैं.
३-सात्विक वृत्ति =बुद्धि से भी ऊपर उठ कर जब हम अपने साक्षी भाव में होते हैं ,देख रहे होते हैं कि आलस घेर रहा है और बुद्धि के कहने से आलस छोड़ दिया है.
४ -ब्रह्म वृत्ति =जब हम अपने को ब्रह्म रूप में देखने लगते हैं.
५ -ब्रह्मकाररस वृत्ति =जब हम अपने साथ साथ पूरे ब्रह्मांड को भी ब्रह्मरूप में देखने लगते हैं.फिर कैसा बंधन कैसी मुक्ति.वहाँ तक पहुंचना ही हमारा लक्ष्य है.

Monday 20 December 2010

ओशो का सत्संग

ओशो के सत्संग में सुना कि धर्म तो एक ही है ,जैसे भगवान एक ही है,पर नाम अलग अलग हैं.इसी तरह कोई बुद्ध,कोई जैन,कोई मुसलमान कोई क्रिश्चयन हो सकता है,पर जरूरी नहीं कि वह धार्मिक भी हो.धर्म को माननेवाला ही धार्मिक होता है.हिंदू,मुस्लिम सिख इसाई होने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता.जैसे स्वास्थ्य एक है पर बीमारियां अलग अलग हैं,उसी तरह धर्म एक ही है,हिन्दू मुस्लिम होने पर हम अलग अलग कर्मकांडों का पालन कर सकते हैं,पर धार्मिक मनुष्यों के मन की स्तिथि एक जैसी होती है.जैसे शांत मनुष्य सब भीतर से एक जैसा अनुभव करते हैं.अशांति के कारण अलग अलग हो सकते हैं.सो सत् चित आनंद एक ही है,खुशी अलग अलग तरीकों से मिल सकती है पर आनन्द एक जैसा ही होता है.

Sunday 12 December 2010

सही संस्कार

अगर हमारा मन कहीं उलझा हुआ है तो रोशनी होने पर भी आखें कुछ देखती नहीं हैं.नाक सूंघता नहीं है भले ही फूलों की खुशबू आ रही हो, कान सुनते नहीं हैं भले ही कोई हंस रहा हो ,रो रहा हो. जीभ को स्वाद की कोई अनुभूति नहीं होती.भले ही स्वादिष्ट खाना मुंह में जा रहा हो. त्वचा को स्पर्श का अनुभव नहीं होता भले ही रेशम से छुआ जा रहा हो.और मन उलझता कब है? जब उसे किसी से राग हो या द्वेष हो.तो पिछले हफ्ते मेरे दांत में दर्द हुआ मन उसमे उलझ गया.दर्द से तो द्वेष ही होगा, राग तो नहीं हो सकता.हाँ दर्द भले ही इस लिये हुआ था कि मिठाई से राग हो गया था. न न करते भी कुछ ज्यादा ही खा ली थी. तो अब मन को उलझन से तो निकालना था ना ताकि मै ठीक से खाने पीने देखने सुनने का आंनद ले सकूँ .उसकेलिए बुद्धि की जरुरत थी,बुद्धि ने फैसला दिया कि डेंटिस्ट के पास जाओ .पर हमारे संस्कार बुद्धि से भी बढ़ कर होते हैं ,उन्होंने बुद्धि को चुप करा दिया यह कहकर कि एलोपैथिक दवा के साइड इफेक्ट होते हैं ,नेट पर भी यही दिखा कि उससे लीवर खराब हो जाता है.दो चार दिन देख लो नमक के पानी से कुल्ला कर लो .वही सब करके एक हफ्ता निकाल दिया. पर दर्द तो गया नहीं,मन को चैन कैसे मिलता फिर बुद्धि की सुननी पड़ी ,डेंटिस्ट के पास गयी.और दवा मिल गयी.पर फिर पुराने संस्कार हावी हो गये .और दवा ले कर रख दी.नमक के गुनगुने पानी से कुल्ला करना शुरू कर दिया.दो दिन निकल गये,तीसरी रात दर्द बढ़ गया ,नींद आनी मुश्किल हो गयी.संस्कारों ने कहा, तुम आत्मा हो ,दर्द शरीर को हो रहा है तुम्हे नहीं.आत्मा से परमात्मा की याद आयी परमात्मा ने कहा जब शरीर अलग है तो दवा खाने से डरती क्यों हो अगर साइड इफेक्ट होंगे भी तो शरीर को ही तो होंगे. और फिर मैने दवा खा ली,आधे घंटे के अंदर चैन मिल गया ,नींद आ गयी.समझ में आगया कि सही संस्कारों का होना कितना आवश्यक है,वर्ना बुद्धि की भी नहीं चलती.

Sunday 5 December 2010

मैं आत्मा हूं

ब्रह्मकुमारी आश्रम के सत्संग में जो सुना और समझ में आया वह कुछ इसतरह से है.
हमारे मन में मुख्यतः चार तरह के विचार आते रहते हैं ,एक तो निगेटिव यानि नकारात्मक होता है,जैसे कि किसी के लिये नापसंदगी ,द्वेष.
दूसरा बेकार का होता है बेमतलब कुछ का कुछ सोचते रहते हैं.खयाली पुलाव पकाते रहते हैं.न तो बात का कोई सिर होता है न पैर .पर मन कहीं टिकता नहीं है अभी इस बारे मे सोचा तो दूसरे ही पल कुछ और सोचने लग गये,ज्यादा समय तो इसी में बेकार करते हैं .
तीसरे होते हैं जरूरी विचार ,जैसे कल ट्रेन पकड़नी है तो इस समय तक तैयार होना है या अभी नाश्ता बनाना है तो उसकी इस तरह तैयारी करनी है ,स्पष्टरूप से पता होता है कि इस समय यह करना है.
चौथा होता है भलाई का ,परोपकार का कि अपनी कामवाली को ये कपड़ा दे दें ,या मंदिर में इतने रूपये चढ़ा दें या इस संस्था को इतना चंदा दे दें .
इस बात को समझाते हुए बताया कि जैसे हमारे पास सौ रूपये हैं तो दस की तो जरूरत की सब्जी ले ली और पांच का मंदिर मे प्रसाद चढ़ा दिया .बीस कहीं गिर गये और बाकी के सत्तर रुपयों से कुछ ऐसी चीजें खरीद लीं जो कि बिलकुल बेकार निकलीं,और इस तरह अपनी जेब खाली कर ली.
इसी तरह हम अपनी सौ प्रतिशत शक्ति में जरा सी शक्ति जरूरी काम में लगाते हैं या किसी का भला करने में लगाते हैं .ज्यादा तो दूसरों की कमियां निकालने में या बेकार का सोचने में व्यर्थ कर देते हैं.
पर अगर हमे शक्ति का स्रोत मिल जाये तो , शक्ति आती है आत्मा से हमे याद रखना होगा कि मैं आत्मा हूँ ,इसकेलिए प्रेमलता बहन ने होमवर्क करने को कहा कि हमे हरेक घंटे में एक मिनट के लिये कहना होगा -मैं आत्मा हूँ ,मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ.

Monday 29 November 2010

ईश योग का सत्संग

आस्था चैनल मे ईशयोग का सत्संग सुना था एक दिन ,जो कुछ समझा वह कुछ इसतरह से था कि हम अन्कोंशयस्ली यानि बेहोशी मे जीये जा रहे हैं.जिसमे सुख व दुःख दोनों ही हैं पर हमारा जीवन एक रट का है,बार बार वही घटित होता है उससे कुछ नया करने की अलग करने की हम कोशिश भी नहीं करते क्योंकि डरते हैं .ऐसा जीवन भी गलत तो नहीं है जीवित रहने के लिये, सर्वाइव करने के लिये .असल मे हम कुछ करते कहाँ हैं बस हुआ चला जा रहा है.सिर्फ अन्तर यही है कि हम अंदर ही अंदर असंतुष्ट से रहते हैं,क्योंकि भूल गये हैं कि हमारे अंदर आनन्द है ,हम बाहर की चीजों मे आनद की तलाश करते हैं उसमे दिक्कतें तो आयेंगी ही .तो करें क्या ?
करना बस इतना ही है कि हम अपना सोफ्टवेयर खुद बनायें .जब खुद बनायेंगे तो गलत नहीं बनायेंगे .पहलेसे गलत बना हुआ है और हम उसी के अनुसार चलते जा रहे हैं बेहोशी मे नींद मे.अपने होश से बनायेंअपना सोफ्टवेयर और फिर देखें कैसे चलता है जीवन .अभी तक हमारा जीवन प्लास्टिक के फूल जैसा है हम जी रहे हैं पर उसमे सुगंध नहीं है ,हो भी कैसे ?प्लास्टिक जो है.प्लास्टिक रियल से ज्यादा सर्वाइव करेगा पर उसमे खुशबू कहाँ से आयेगी सो जीवन को असली बनाओ .वह होश मे आने से हो सकता है.असली फूल जल्दी कुम्लाह भी सकता है पर उसकी खुशबू कीमती है.हमारा मन कंडीशंड है उसी को संस्कार भी कहते हैं,उसी को कर्म भी कहते हैं ,उसे होशपूर्वक देखना होगा यानि जागना होगा .अभीतक सब कुछ सोये सोये आटोमेटिक चल रहा है उसे जागकर बदलने की जरूरत है.

Monday 22 November 2010

नीरू माँ का सत्संग

नीरू माँ के सत्संग में सुना था कि हम जो भी कर रहे हैं सब पहले से व्यवस्थित है .हमारा उठना बैठना चलना फिरना ये सब तो प्रकृति के द्वारा स्वभाववश होता रहता है.
इसके अलावा हमे जो काम करने पड़ते हैं किसी के कहने पर या अपनी इच्छा से प्रेरित होकर ,वे सब कर्मफल हैं.कर्म तो हमारे अंदर के भाव हैं उस भावदशा के अनुसार ही कर्मफल होते हैं अच्छे या बुरे.इसलिए ही कहा जाता है कि अच्छे संस्कार डालो ,अच्छा सोचो.सो हमे जो भी कर्मफल मिल रहा है उसे भोगते हुए अपनी भाव दशा बिगाड़नी नहीं चाहिए .सम रहना चाहिए.क्योंकि तभी हम नया कर्मफल बांधने से बच पायेंगें .
और इसके लिये आसान तरीका तो यही है कि अपने को कर्ता समझें ही नहीं जैसा कि गीता मे बताया गया है कि सब स्वभाव से ही हो रहा है.अपने अहंकार को बीच में मत लायें .अहंकार यानि अपनी मै को बीच में लाने पर ही भाव बनते हैं पुण्य के या पाप के.जब हम कर्ता ही नहीं हैं तो अहंकार का सवाल ही नहीं उठता .

Monday 15 November 2010

आत्मा का आनन्द

हमारी भूख प्यास ,सर्दी गर्मी प्रकृति के नियम हैं ,इनके हल उसी तरह निकलते रहते हैं जैसे कि पशु पक्षी इन सबका मुकाबला करते हैं.मनुष्य के पास दिमाग है इसलिए अगर वह पक्षियों के समान उड़ नहीं सकता तो उसने हवाई जहाज बना लिये,मछली की तरह तैर नहीं सकता तो नाव बना लीं पानी के जहाज बना लिये .चीते की तरह दौड़ नहीं सकता तो कारें बना लीं .बनाने मे भी आनंद आता है जब भी हम कुछ नया निर्माण करते हैं तो आनन्द होता है.मनुष्य के अंदर से ही नवनिर्माण के विचार आते रहते हैं और वह नवनिर्माण करता रहता है.और पुरानी वस्तुएं नष्ट होती रहती हैं.ये सब आत्मा की शक्ति से होता है.आत्मा डायरेक्ट तौर पर कुछ नहीं करती पर उसके होने से ही सब कुछ होता है.जैसे सूरज के होने से सब होता है.फूलों की खुशबू और कचरे की सड़ान्ध दोनों सूर्य के होने से ही होती हैं पर सूरज पर न तो खुशबू का कोई असर होता है न ही सड़ान्ध का .इसी तरह आत्मा की शक्ति से ही सब होता है अच्छा भी और बुरा भी. पर मेहनत तो इन्सान को करनी ही पड़ती है अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये.डायरेक्ट रूप से किसी भी भौतिक जरुरत को पूरा करने की मेहनत हमेशा दुखदायी होती है.मेहनत हमेशा ईश्वर के निमित्त बन कर करनी चाहिए.आवश्यकतायें ईश्वर ने ही दी हैं.वही पूरा करता है.और कर भी रहा है.हम अपनी जरूरतों को पूरा करने मे कुछ इस तरह उलझ जाते हैं जैसे कि जरूरतें हमारे लिये नहीं हैं हम उनके लिये हैं.और तब तो हमारे परिश्रम का कोई अंत ही नहीं है.पर अगर ईश्वर के निमित होकर करते हैं तो मेहनत में आनंद मिलता है ,थकावट मे भी आनंद मिलता है.

Sunday 7 November 2010

तो....

ईश्वर दयालु है ,वह जब हम पर दया करता है तो सुख मिलता है.
पर जब दुश्मन पर दया करता है तो.....
ईश्वर बहुत दानी है जब हम पर दया करता है तो बहुत सुख मिलता है.
पर जब दुश्मन को देता है तो....
ईश्वर क्षमा करनेवाला है ,जब हमारे अपराध क्षमा करता है तो हमें सुख मिलता है .
पर जब दुश्मन के अपराध क्षमा करता है तो....
ईश्वर न्यायकारी है ,जब वह दुश्मन को दंड देता है तो हमे सुख मिलता है.
पर जब हमे दंड देता है तो....
जब हम पाकिस्तान से क्रिकेट में जीतते हैं तो हमे सुख मिलता है
पर जब पाकिस्तान जीतता है तो .....

Monday 1 November 2010

खुला आकाश हो जैसे

मंदिर मे लगातार घंटी बजाना क्या अर्थ रखता है?या शिवलिंग पर जल चढ़ाना या कोई भी पूजा करने का जो कर्मकांड है,उसका क्या तात्पर्य है?मेरे दिमाग मे जो आ रहा है वह यह है कि हम जो भी करते हैं दिमाग से करते हैं और दिमाग से करने का अर्थ है कि उसमे कोई अर्थ ढूंढना, लोजिक ढूंढना.जब कोई मतलब नहीं मिलता तो दिमाग को संतुष्टी नहीं होती.दिमाग वह करना नहीं चाहता.
तो यही है उस बात का उत्तर कि हम अन्लोजिकल कर्मकांड क्यों करते हैं?इसलिए करते है कि हम अपने दिमाग से बाहर आ जायें.दिमाग की सीमा मे रह कर तो हम वही और वैसा ही सोचेंगे जैसाकि हमारा दिमाग है.कोई कैसा दिमाग रखता है तो कोई कैसा ?दिमाग ही सुख दुःख के बंधन मे डालता है.पर ईश्वर दिमाग से पकड़ मे आने वाला नहीं है. वह दिमाग से परे की बात है.सो दिमाग को एक तरफ रख कर कर्मकांड करना होता है.वह चाहे लगातार राम नाम का जाप हो या जल चढ़ाना हो.दिमाग को बीच मे मत लाओ.
जैसे हमारे रहने का एक घर होता है.पर उसमे लगातार कोई भी नहीं रह सकता.तो हर घर मे एक खुला आंगन ,खुली छत भी होती है..गरीब हों या अमीर सब थोड़ी देर के लिए खुले आकाश में आते ही हैं और आना ही चाहते हैं.कभी कभी साप्ताहिक तौर पर पिकनिक मनाने कुछ घंटों के लिए और कभी कैम्पिंग के लिए कुछ दिनों के लिए भी जाते हैं.यानि हरेक अपनी चारदीवारी से बाहर निकल कर खुशी महसूस करता है.उसी तरह से हमारा दिमाग है जिसमे हम लगातार रहते रहते घुटन महसूस करते हैं.उससे बाहर जाने का रास्ता है रामनाम का जपना .लोजिकल बातों से हटना.जहाँ कमजोर दिमाग श्रेष्ठ दिमाग सब बराबर होते हैं .करके देखो और शांति का अनुभव लो.थोड़ी देर रोज. फिर साप्ताहिक तौर पर कुछ घन्टों के लिए और फिर कुछ दिनों के लिए.क्योंकि ईश्वर दिमाग के अंदर नहीं बाहर है.

Monday 25 October 2010

पति परमेश्वर

आज करवाचौथ है तो मन में एक ख्याल आया कि क्या आज भी पत्नी अपने पति को अपना परमेश्वर मानती हैं.
जिस देश मे पत्थर को भी भगवान मान कर पूजा की जाती हो वहाँ पति को परमेश्वर का दर्जा देना बिल्कुल स्वभाविक बात है.आखिर परिवार में पत्नी का केंद्रबिंदु पति होता है .और बच्चों की केंद्रबिंदु माँ होती है.
पुरुष की जिम्मेदारियां स्त्री की जिम्मेदारियों से अलग तरह की होती हैं .ये बात और है कि हमेशा ही कुछ स्त्रियाँ पुरुषों की तरह की जिम्मेदारियां वहन कर लेती हैं.पर तब हम उस स्त्री के बारे मे कहते हैं कि इसमें तो मर्दों जैसी हिम्मत है.और जो पुरुष स्त्री जैसी जिम्मेदारी निबाह लेते हैं,उन्हें स्त्रियों जैसा कोमल ह्रदय रखने का ख़िताब मिलता है
जैसे बच्चे की रक्षा के लिए माँ के अंदर छिपे हुए हिम्मत बहादुरी शोर्य जैसे मर्दों वाले गुण प्रकट हो जातें हैं.उसी तरह एक पत्नी जब पति को परमेश्वर मानते हुए समर्पित होती है तो पति के अंदर छिपे हुए प्रेम और शांति के नारी सुलभ गुण प्रकट हो जाते हैं.
स्त्री व पुरुषों को ए़क दूसरे के गुण तो अपनाने ही चाहिए उसके बिना तो वे दोनों अधूरे हैं इसीलिये तो दुर्गा माँ को शेर की सवारी करते हुए और हथियारों से लैस दिखाया जाता है.और कृष्ण भगवान को फूलों का श्रंगार करके बांसुरी बजाते हुए दिखाते हैं.
जिस तरह बच्चे का जन्म होते ही माँ का भी जन्म हो जाता है,उसी तरह स्त्री जब पत्नी के रूप मे पूरी तरह समर्पित होती है तभी पुरुष पति परमेश्वर बनता है.स्त्री के अहं की संतुष्टि माँ के रूप से होती है .माँ से ही तो परमेश्वर का जन्म होता है.
परमेश्वर का दर्जा देने का कारण ये भी है कि सारे इंसानी रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमे कहीं न कहीं कोई पर्दा रहता है.सिर्फ परमेश्वर से हम कुछ भी छिपा कर नहीं रख सकते.जिस तरह बच्चे अपनी माँ से कुछ नहीं छुपाते उसी तरह एक समर्पित पत्नी अपने पति से कुछ नहीं छुपाती.

Tuesday 19 October 2010

ओशो का सत्संग

ओशो का ये सत्संग मुझे बहुत अच्छा लगा .अपने शब्दों मे लिखने का प्रयास करती हूं.
हम अपने ही शरीर के मालिक नहीं बनते हैं,हमारे शरीर रूपी मकान मे पांच नौकर हैं.आँख ,नाक, कान ,जीभ,और चमड़ी .हमने अपनें नौकरों को इतनी ज्यादा पावर दे दी है कि वह खुद को ही मालिक समझने लगे हैं.हम चुपचाप देखते रहतें हैं ,कभी तो देखते भी नहीं.आँखें बंद किये पड़े रहते हैं. जब शरीर में कोई उपद्रव होता है ,बीमारी होती है तब हमारी आँखे खुलती हैं.आखें अपने को मालिक समझते हुए टीवी के सामने बैठे रहना चाहती है. सत्संग या कोई अन्य ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देखने सुनने के बजाय आँखे और कान रोने धोने के या उत्तेजक डांस गानों के चैनल देखने सुनने लग जाते हैं.जीभ अपने को मालिक समझते हुए मिठाई चाट पकोड़ी का आनंद लेना चाहती है,स्वादिष्ट नाश्ता खाने के चक्कर मे पोष्टिक अंकुरित मूंग पड़ी रह जाती है.नाक को ताजे फूलों की खुशबू नहीं बनावटी डेडोरेन्ट और परफ्यूम चाहिए. चमड़ी रेशमी मुलायम कपड़ो का आनंद लेना चाहती है.सुबह समय से उठने के बजाय नरम बिस्तर को छोडना ही नहीं चाहती.सो व्यायाम करने की फुरसत ही नहीं मिलती.ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि हम स्वयं सोये हुए हैं.और इस बात का फायदा उठाते हुए नौकर मालिक बन गये हैं.

Thursday 14 October 2010

मन का संतुलन

आज के विचार कुछ इस तरह से आ रहे हैं कि हम जब भी कोई मूवी देखते हैं तो उसमे देखतें हैं कि कितने सारे पात्र कितनी तरह का रोल कर रहे हैं पर रोल करते समय उन्हें पता होता है कि वे रोल कर रहे हैं.उस रोल को निबाहने के बाद अपने साथी पात्रों के साथ नार्मल व्यवहार करते हैं,रोल के अनुसार नहीं.रोल में वे आपस मे भाई बहन हो सकते हैं,मित्र हो सकते हैं,दुष्मन हो सकते हैं .पर रोल के बाहर आपसी रिश्ता एक्टर का होता है.शाहरुख को पता होता है कि वह देवदास नही है,एश्वर्या को पता होता है कि वह पारो नहीं है.ठीक इसी भावना के तहत हम अपना रोल प्ले करें तो.....,हमे हमेशा याद रखना चाहिए कि जन्म लेते ही हमें जो शरीर मिला है नाम मिला है,धर्म मिला है ,पोजिशन मिली है .कहीं हम सीनियर होते हैं कही जूनियर होतें हैं,कभी ताकतवर होते हैं कभी कमजोर होते हैं.ये सब बाहर की अवस्थाएं हैं जो बदलती रहती हैं.असल में हम इसके अंदर हैं,और वह अवस्था हमेशा एक जैसी रहती है कभी नहीं बदलती.वह न हिंदू है न मुसलमान है.अमीर है न गरीब है.सभी के भीतर वह अवस्था सदा एक जैसी है.अगर उस अवस्था का हमे हमेशा ख्याल बना रहे तो हम अपना रोल प्ले करते समय अपना संतुलन कायम रख पायेगें.

Wednesday 6 October 2010

मोह श्रंखला (जहाये आछे बाधा )

महान कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर की कविता जो मुझे बहुत पसंद है.


मेरे मोह की जंजीर बड़ी द्रढ़ है
तू उसे तोड़ दे ,यही मेरी कामना है.
किन्तु उसे तोड़ते हुए मेरा मन दुखी हो जाता है,
मुक्ति मांगने के लिए मैं तेरे पास जाता हू,
किन्तु मुक्ति की आशा से भयभीत हो जाता हूं.
मेरे जीवन मे तू ही मेरी सर्वश्रेष्ठ निधि है,
तुझसा अनमोल धन दूसरा कोई नहीं
.यह मै जानता हूं,किन्तु मेरे घर मे जो टूटे फूटे बर्तन हैं ,
उन्हें भी फैकने को दिल नहीं मानता .जो आवरण मेरे शरीर पर पड़ा है,ह्रदय पर पड़ा है ,
धूल धुसरित है और म्रत्यु के श्राप से ग्रसित है.
मेरा मन उसे धिक्कारता है,तो भी उससे मुझे लगाव है
मेरे ऋणों का अंत नहीं है ,मेरे खाते मै अनेक जनों की रकमें जमा हैं
मेरे जीवन की विफलताएं बड़ी हैं ,मेरी लज्जा की सीमा नहीं.
फिरभी जब कल्याण की भीख मांगने तेरे सामने आता हूं
तो मन ही मन डर से काँपता हूं,
कही मेरी भीख स्वीकार न हो जाये ,
कहीं मेरे शरीर व ह्रदय के मैले आच्छादन को तू उतार न ले.
मेरी बंधन श्रंखला को तू तोड़ न दे.

Monday 4 October 2010

नशा-जो मन के पार ले जाये

पिक्चर्स मे देखा है कि जब भी किसी को कोई दिल की बात जुबान पर लानी होती है तो शराब का नशा काम आता है.या तो कोई अपनी मर्जी से पीता है या धोखे से पिलाई जाती है.तो इसका मतलब क्या निकलता है.मेरे ख्याल से उस समय वह मन के पार हो जाता है.उसी के मन का उस पर कोई कंट्रोल नहीं होता.इसलिए वह अपने को मुक्त महसूस करता है पर शराब का नशा कुछ देर का ही होता है,और साथ ही उसके शरीर के लिए नुकसानदायक होता है.पर जब तक नशा न हो तब तक व्यक्ति अपने को भूल नहीं पाता,और भूले बिना उसे आनंद नहीं मिल सकता ,क्योंकि स्वयं में उसे ढेरों कमियां दिखती हैं कमजोरियां दिखती हैं.पूरी जिन्दगी कोई अपने को परफेक्ट बनाने में लगा दे तब भी नहीं बना सकता क्योंकि हर व्यक्ति की क्षमताओं की अपनी सीमा है.पर चोबीसों घंटे तो शराब के नशे मे रहना कोई समस्या का हल तो नहीं.इस नशे की बेहोशी मे वह बहुत कुछ ऐसा भी कर बैठता है जिसका उसे होश आने पर बहुत पछतावा होता है.लेकिन नशा तो चाहिए इंसान को .खोज इस बात की है कि कौन सा नशा है जो भगवान बुद्ध को भी मुस्कराने पर मजबूर कर देता है.जिसके नशे मे राम और कृष्ण भी मुस्कराते रहतें हैं मुझे लगता है कि वह है अपने अस्तित्व के प्रति प्रेम का नशा .कोई जरा रुक कर देखे इस अस्तित्व को जिसका जरा सा हिस्सा हमारा यह संसार भी है तो वह इसके प्रति एक ऐसी श्रधा से भर जायगा कि अपने को भूल जायेगा,उसे याद ही नहीं रहेगा कि वह ए़क अधूरा व्यक्तित्व है.उसे समझ आने लगेगा कि वह इस अस्तित्व का ही अटूट हिस्सा है.फिर कैसी कमी और कैसा दुःख.

Wednesday 29 September 2010

जो मैने समझा

स्वामी विवेकानंदजी की किताब पढ़ने से जो समझ में आया और महसूस भी किया कि आत्मा +मन हैं हम.मन ही असल में माया है.सुख दुःख के झूले में झूलता रहता है.कुछ अच्छा लगता है फिर नहीं लगता है.अरे भाई ,ऐसा तो होगा ही.कपड़े साफ़ हैं तो वे मैले तो होंगे ही.पसंद नहीं हैं ,कहने का क्या मतलब?साफ करो कपड़े को. जब तक हम मायानगरी में हैं ,इन द्वंदों से पाला तो पड़ेगा ही.इनके बिना ये मायानगरी बनेगी कैसे?अगर आनंदित रहना चाहते हैं तो अपने को इन द्वंदों से जोड़ें मत .
कपड़े अगर मैले हैं तो धो दें ,अगर मैले ही पहनने पड़ गये तो दुखी तो मन करता है न ,मत सुनिए मन की बात ,कपड़े ही तो मैले हुए हैं न आप तो मैले नहीं हुए.ऐसे ही जब मन किसी बात से खुश होता है ,तब भी मन से अलग हट कर मन को देखने की जरूरत है न कि मन के साथ एक हो जाने की.क्योंकि जब हम मन को देखना शुरू कर देतें हैं तभी उसे कंट्रोल कर सकते हैं.मन के साथ ए़क होकर हम खुद को भूल गये हैं.
दूसरी बातसमझ में आई कि जब हमे कोई ऐसा दुःख मिले कि उसे सहन करना ही पड़े तो सहन नहीं करें,स्वीकार करें.सहन करने से दुःख मिटता नहीं है ,स्वीकार करने से मिटता है.जब कभी अपने बच्चे के लिए हमे रात भर जागना पड़ता है,तब हम सहन नहीं कर रहे होते स्वीकार कर रहे होते हैं,क्योकि हमे अपने बच्चे से प्रेम होता है.इसीतरह हमे अस्तित्व के प्रति प्रेम होगा तो हम उस कष्ट को अपनी नियति मानते हुए खुशी से स्वीकार कर लेंगे.

Friday 24 September 2010

स्वामी विवेकानंद कहते हैं

वेदांत में वैराग्य का अर्थ है- जगत को ब्रह्मरूप देखना .जगत को हम जिस भाव से देखते हैं,उसे हम जैसा जानते हैं,वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभासित होता है ,उसका त्याग करना और उसके वास्तविक रूप को पहचानना .
उसे ब्रह्मस्वरूप देखो.वास्तव में ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है.इसी कारण जगत में जो कुछ भी है उसे ईश्वर से ढक लेना होगा.
जीवन में, मरण में, सुख में ,दुःख में सभी तरह की अवस्थाओं में ईश्वर समान रूप से विद्यमान है, तुम कोई भी नहीं हो.मैं भी कोई भी नहीं हूं,कोई भी कोई नहीं है.सब उस प्रभु की ही वस्तुएं हैं ईश्वर तुम्हारे भोग्य धन में है,तुम्हारे मन में जो वासनाएं उठती हैं,उनमे है,अपनी वासना से प्रेरित हो जब तुम जो जो द्रव्य खरीदते हो,उनमे भी वह है.और तुम्हारे सुंदर अलंकारों मै भी वही है.

Wednesday 22 September 2010

ईश्वर की माया और प्रेम

रोशनी का अभाव अँधेरा है .सत्य का अभाव झूठ है .पर अँधेरे का कभी अभाव नहीं होता,न ही झूठ का कभी अभाव होता है.अभाव उसी का होता है जिसका कोई भाव हो.अँधेरे और झूठ का कोई भाव ही नहीं होता तो अभाव कैसा ?असल में ये हैं ही नहीं सिर्फ मायाजाल है ,एक माचिस की तीली जलाते ही अँधेरा भाग जाता है.सच्चाई के सामने झूठ नहीं टिकता ,ठीक इसीतरह हैं क्रोध,घृणा द्वेष ,लालच आदि दुर्गुण.जोकि असल में तो हैं ही नहीं .पर चूँकि प्रेम नहीं है ,प्रेम का अभाव हो गया है सो ये नजर आतें हैं.प्रेम का प्रकाश फैलते ही न तो क्रोध टिकता है न ही घ्रणा द्वेष लालच .सो जरुरत प्रेम की है.

Saturday 18 September 2010

अदृश्य शक्ति का मायाजाल

क्या मैंने इस लैपटॉप को बनाया है ?क्या मैने गूगल.कोम को बनाया है,क्या मै इस ब्लॉग सिस्टम को बना सकती थी.इस बिस्तर को, इस तकिये को जिसका सहारा लेकर मै लिख रही हूं .इस मकान को, इस शहर को , आखिर कहाँ तक गिनाया जाय,कुछ भी तो मैने नहीं बनाया.और ये सब कुछ कोई एक व्यक्ति तो बना भी नहीं सकता.हर जरा सी चीज के निर्माण में अनगिनत व्यक्तियों का हाथ होता है,मरे पास जो कुछ भी है.जो कुछ भी मै खाती पीती हूं उन सब को कितने ही हाथ स्पर्श कर चुके हैं ,सोचते ही सिहरन सी होती है .हमारे स्वयं के निर्माण मे भी तो न जाने कितनों का हाथ है .तो फिर क्या हम कुछ भी नहीं.नहीं ऐसा भी नहीं.हम सब कुछ हैं पर अकेले कुछ भी नहीं.एक अदृश्य शक्ति है जो सबसे काम ले रही है.उस अदृश्य शक्ति से जुड़ कर ही सब कुछ हैं.वही शक्ति लोगों के दिल दिमाग में भर देती है कि वे अकेले कुछ भी कर सकते हैं.शायद इसे ही मायाजाल कहते हैं . अगर मायाजाल न हो तो संसार बनेगा ही नहीं.हम मायाजाल से बने इस अद्भुत संसार का आनंद उठा सकते हैं अगर स्वंय को उस अदृश्य शक्ति के साथ जोड़ लें. निर्णय करने में हम पूरी तरह से स्वतंत्र हैं.

Wednesday 15 September 2010

संसार संसार ही रहेगा

संसार को कोई कभी भी नहीं सुधार सकता.हमेशा ही उसमे फिफ्टी फिफ्टी का चक्कर रहेगा,यानि आधा शुभ आधा अशुभ.सुख और दुःख उसमे हमेशा बराबर बने रहते हैं.उसी स्थिति का नाम ही तो संसार है.हम अच्छा ,बुरा कुछ भी न करें तो संसार में रहेंगे.पर इंसान कुछ भी किये बिना रह ही नहीं सकता.कभी अच्छा करता है कभी बुरा.उसी के अनुसार उसके मनोभाव बदलते रहते हैं,कभी उसे लगता है वह स्वर्ग में है कभी लगता है नरक मै है.स्वर्ग में हैं तब तो सोचना ही क्या,पर अगर लगता है कि कहाँ नरक में आ गये हम. नरक से निकलना चाहते हैं तो सिर्फ एक ही तरीका है वहाँ से निकलने का,मन ही मन माफी मांगिये उससे ,जिसके कारण आप तकलीफ पा रहे हैं.आपने उसे दुःख पहुचाया है जाने अनजाने में ,अब वही दुःख आपको दुखी कर रहा है.क्षमा मांग कर फिर से संसार में कदम रखिये. आप को लगता है कि गलती तो उसकी है क्षमा उसे मांगनी चाहिए तब भी मन ही मन आप क्षमा मांगे.नरक से छुटकारा तो आपको चाहिए.उसे नहीं.शुभ करिए और स्वर्ग में स्थान प्राप्त करिये.संसार को बदलने का ठेका मत लीजिए.अपना स्थान देखिए आप कहाँ पर हैं.संसार तो हमेशा ही मिलाजुला रहने वाला है.

Saturday 11 September 2010

बन जाओ योगी

जितने भी महापुरुष हुए हैं ,सब पर तरह तरह की विपदायें आयी हैं .महात्मा गाँधी हों या दलाईलामा.भगवान बुद्ध हों या ओशो.
राम ,कृष्ण जिन्हे हम भगवान मानते हैं ,उन पर भी कष्ट आये हैं.उन्होंने भी दुश्मनों का सामना किया है.
पांच पांडवो ने भी कम कष्ट नहीं झेले .और हम ये भी मानते हैं कि हमारी विपदायें हमारे ही कर्मों का फल हैं.तब इसका मतलब यह हुआ कि इन सारी महान विभूतियों ने कुछ अच्छे कर्म नहीं किये थे,जिनका फल उन्हें इस तरह मिला.
राम ,कृष्ण के लिए तो कहा जाता है कि वे तो लीला कर रहे थे.सब कुछ जानते थे,सिर्फ संसार को कष्टों से मुक्त करने के लिये अवतार लिया था और साधारण मनुष्यों की तरह कष्ट भोगते हुए उनका मुकाबला करना सिखाया आम लोगों को.उनके लिये तो सब खेल था ,लीला थी.
तो क्या हम सब भी उसी लीला का अंग नहीं हैं.हमे भी तो उसकी लीला में खेल करने के लिए एक पार्ट मिला हुआ है.हमे उस पार्ट को अच्छी तरह से अदा करना है. इसलिए हमे हमेशा याद रखना होगा कि हम उस प्रभु की लीला में एक पार्ट अदा कर रहें हैं,तब तो हम अच्छी तरह से अपनी जिम्मेदारी निबाह पायेंगे .
जो ईश्वर को भूल कर इसतरह जीता है कि अपने बल पर खूब मेहनत कर के तरक्की करेगा,अपने बल पर पूरी दुनिया पर राज करेगा.खूब सारी धन दोलत इकट्ठा करेगा.वह जब आख़िरी समय आता है तब महसूस करता है कि सारी भागदौड़ बेकार ही थी.आखिर क्या पाने के लिए दिन रात का सुखचैन गवाया .कितनों से दुश्मनी मोल ली .पिछले जन्म का तो कुछ याद नहीं कि कैसे कर्म किये थे पर इस जन्म अपना प्रभुत्व जमाने के लिए न जाने कितनों के दिल दुखा दिए .सो हमे अपने को ईश्वर की लीला का हिस्सा मानते हुए अपने हिस्से की जिम्मेदारी खुशी खुशी निभानी चाहिए,पार्ट चाहे जो भी हो.कहने का मतलब है कि सुख और दुःख दोनों हर इंसान के हिस्से में बराबर बराबर आते हैं,उनके प्रकार अलग अलग होते हैं.जो लोग उपर से बिलकुल सुखी लगते हैं उनके मन की हालत उन्हें ही पता होती है.पर कई मन के राजा होते हैं पर देखने मै कंगाल लगते हैं.अन्तर सिर्फ सोच का है,ईश्वर से अपने को अलग मानते ही हम उसकी लीला से अलग एक निरीह प्राणी बन जातें हैं,और उससे अपने को जोड़ते ही उसकी लीला के महत्त्वपूर्ण पात्र बन जाते हैं.तो हमे हमेशा अपने को ईश्वर से जोड़कर देखनाहोगा .जोड़ना ही तो योग कहलाता है इससे हम योगी बन जाते है.अलग होते ही भोगी हो जाते हैं.भोगी तो कष्ट भोगता ही है , कोई भी सुख बिन दुःख की छाया के नहीं मिलता क्योकि दोनों जुडे हुए हैं दिन और रात की तरह.इसलिए योगी बनो और हमेशा परमानन्द में रहो.

Tuesday 7 September 2010

मुझे कुछ नहीं कहना है

तुम खुश नहीं लग रही हो ,
हाँ, मैं खुश नहीं हूँ
तुम ईश्वर में विश्वास रखती हो.
हाँ,रखती हूँ.
गलत,बिलकुल गलत.
या तो कहो,खुश हो.-सिर्फ नाटक कर रही हो न खुश होने का
या फिर कहो कि ईश्वर पर भरोसा नहीं है .
अगर मानती हो,और फिर भी खुश नहीं हो तो
ये तो ऐसे हो गया जैसे कोई किसी सवारी से कहीं जा रहा हो ,
और फिर भी बोझ सर पर लादा हुआ हो .
अरे भाई, जो सवारी तुम्हारा बोझ उठारही है ,
वही तुम्हारे सामान का बोझ भी तो उठा ही रही है.
तो सर से उतार दो उसे .
अगर जवाब है कि ईश्वर को नहीं मानती हो तो फिर तो तुम्हे पूरा हक है दुखी
होने का.
तरीके खोजती रहो खुश होने के ,
फिर मुझे कुछ नही कहना.

Saturday 4 September 2010

दुनिया बीमार सी क्यों है?

शरीर के अंदर न जाने क्या कुछ चलता रहता है.हमे तो कुछ दिखाई नहीं देता.कैसे भोजन पच जाता है?कैसे खून बन जाता है?कैसे साफ़ हो जाता है?कैसे नाख़ून बन जातें हैं? कैसे मांस बन जाता है? कैसे नींद आ जाती है? कैसे आँख खुल जाती है?सोचने बैठो तो करिश्मों का कोई अंत नही नजर आता. पर हमारे बस में अगर कुछ है तो यह किहम नियमानुसार चलते रहें. जहाँ कहीं बेतरतीबी की कि उसका असर हमारे शरीर पर दिखने लग जाता है.तरह तरह के रोग घर कर लेते हैं .सो नियमानुसार चलना जरूरी हो जाता है.हीक इसी तरह यह बाहर की दुनिया भी है.यहाँ भी कुछ नियम काम करतें हैं.अगर हम नियम से चलें जैसे कि समय से अपनी ड्यूटी पूरी करें.आदर से हर एक से बात करें.जो काम जिस तरह से करना चाहिए उसी तरह से करें.तो काहे की मुसीबत हो.पर ऐसा होता नहीं है,हम अपना काम समय से नहीं करतें हैं,हम हर एक को आदर भी नहीं देतें हैं हम जैसेतैसे काम निबटाते हैंऔर फिर जब दुनिया की शक्ल बीमार नजर आती है तो दुखी होते हैं.

Sunday 29 August 2010

हम मानें अपनी बात

हमें पार्लर जाना चाहिये या नहीं.हमें सबके सामने डांस करना चाहिये या नहीं .हमें फैशैनब्ल कपड़े पहनने चाहिए या नहीं.इस तरह की कितनी ही  बातें हैंजिन पर बहस की जा सकती है.दोनों पक्ष अपनी अपनी बात को सही सिद्ध कर सकतें हैं.तो फिर किसकी बात मानें.

हम अपनीबात मानें.हमारे लिये क्या ठीक है,वो हम ही फैसला ले सकतें हैं.

क्या कृष्ण या राम या महवीर या बुद्ध  सब एक  जैसे थे.राम तो गोपियाँ के साथ नाच नहीं सकते,न  ही बांसुरी बजा  सकते हैं.बुद्ध  तो हथियार नहीं चलाते  थे.महावीर तो कपड़े तक नहीं पहनते थे.तो तुम किस की नक़ल करोगे.हम हम हैं .जैसे राम राम थे,कृष्ण कृष्ण थे बुद्ध  बुद्ध  थे.उसी तरह हमारे सारे  डिसीजन हमारी अपनी प्रकति के अनुसार ही होंगे.हमारे लिए जो सहज है,हमे वही करना  है.जो हम नहीं हैं वो बनने की कोशिश फालतू है.

Tuesday 24 August 2010

मंजिल

कोई भी मंजिल पाकर क्या होगा ,यह जग तो जैसा है ,वैसा ही होगा .

ऊँचा पर्वत होना हो तो खाई भी तो किसी को होना होगा.

मीठे के साथ नमकीन को तो  भी रखना होगा.

जब तक मूरख न हों तो कोई बुद्धिमान कैसे कहलायेगा .

हर  आने वाला पल मेरी मंजिल है.

मै जैसी हूं वैस ही भली हूं.मुझे और नहीं कुछ होना है.




Saturday 21 August 2010

मेरी मंजिल

जिनको भी हम 'महान ' हैं ऐसा कहते,उन सबने बहुत से कष्ट हैं झेले 

चाहे वो हों राम,कृष्ण या गाँधी ,सीता या फिर मीरा 

तो फिर मैं क्या बनना चाहूँ ?क्या हो मेरी मंजिल?

कोई भी मंजिल पाकर क्या होगा ,



Monday 16 August 2010

अन्याय

राम के साथ अन्याय हुआ ,कृष्ण के साथ अन्याय हुआ, गाँधी के साथ अन्याय हुआ ,मोहम्मद और ईसा  के साथ भी. पर इसी ने तो उन्हे राम, कृष्ण, गाँधी ,मोहम्मद, ईसा बनाया. 

Thursday 29 July 2010

ईश्वर की मर्जी

रावण को ईश्वर ने बनाया था क्यों कि कहतें हैं ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता .

पर क्यों बनाया ? क्योंकि दुनिया का खेल ऐसे ही चलता है.रावण के साथ राम को भी बनाया 

कंस के साथ कृष्ण को भी बनाया .लादेन के साथ किसको बनाया है अभी पता नहीं चला.