Monday 5 December 2011

रिटर्न गिफ्ट



हम जिससे कुछ पाते हैं उसे वापिस कुछ देना बहुत जरूरी है.वरना दोनों ही नही बचेंगें.और यह भी सच है कि जैसा देंगें वैसा ही पायेंगें.
अक्सर कहा जाता है कि पापी पेट के लिए इंसान को क्या कुछ नही करना पड़ता .पेट के लिए हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ काम करती हैं तब जाकर हमारा पेट भरता है पर पेट बाहर से काम करता हुआ भले ही नही दिखाई दे लेकिन वही तो हमारी सारी इन्द्रियों को काम करने की ताकत देता है .हम काम भी कर पाते हैं और तरह-तरह के सुखों का उपभोग भी कर पाते हैं.
पर अगर पेट का ख्याल न रखें उसे सही डाईट न दें .उसे सही खुराक देने के लिए मेहनत न करें तो पेट तन्दरुस्त नही रहेगा उसे सही भोजन देते रहें तो बाकी का काम तो वह चुपचाप करता रहता है ताकि हमारे हाथ -पावं सही सलामत काम करते रहें
इसी तरह संसार भी एक बहुत बड़ा पेट है और उसकी खुराक प्रेम है .अगर उसे प्रेम मिलता रहे तो वह ठीक ठाक काम करता रहता है.नफरत रूपी सड़ा खाना मिले तो बीमार हो जाता है.संसार से हमे वही तो मिलेगा जो हमने इसके पेट में डाला था .

Tuesday 22 November 2011

ध्यान



ईश्वर निराकार है पर उसकी समझ हमें आकार से ही मिलती है.आकाश निराकार है पर उस पर सूरज चाँद सितारे बादल अपने अपने आकार में नजर आतें हैं.उससे ही हमें निराकार का बोध होता है.
उसी तरह उस निराकार आकाश में निराकार चेतन शक्ति भी है.उसी चेतन शक्ति से तो सूरज चाँद सितारे बादल टिके हुए हैं.वही चेतन शक्ति वही आकाश हमारे भीतर और बाहर है. गुब्बारे से गैस निकल जाये तो वह उड़ नहीं सकता ,इसी तरह हमारे भीतर के आकाश से भी अगर चेतन शक्ति निकल जाये तो हम निर्जीव हो जाते हैं.
ध्यान में हम उसी चेतन शक्ति को महसूस करतें है,जो हमारे सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक फैली हुई है.उसको महसूस करते करते हम उस सम्पूर्ण चेतन शक्ति से जुड़ने लग जाते हैं जो हमारे बाहर भी है और हम सबके भीतर भी है

Friday 4 November 2011

सोहनी का बचपन-भाग (१)


 सोहनी का  पहला अनुभव चार साल की उमर में चोट का- हाथ में मेहंदी लगा कर सुखाने के लिए गोल गोल तेजी से घूम रही थी ,और किसी से टक्कर खाकर गिरी ,माथे में लोहे की साबुनदानी चुभ गई जिसका निशान अभीतक है.
पहला दुखद अनुभव स्कूल का( भद्दा मजाक )जब सोहनी पांच साल की थी ,मास्टर(जी  ?)ने जानबूझ कर उसकी तख्ती के ऊपर( जिस पर अ आ इ ई उ ऊ लिख रही थी )साईकिल चला दी थी ,उसके पहिये से सारी लिखाई खराब हो गई थी.
पहला अनुभव स्टेज का -छह साल की उमर में स्कूल की स्टेज पर सुनाई थी यह कविता .
जिसने सूरज चाँद बनाया,जिसने तारों को चमकाया.
जिसने चिड़ियों को चहकाया ,जिसने सारा जगत बनाया.
हम उस ईश्वर के गुण गायें,उसे प्रेम से शीश झुकायें.
कक्षा के हर बच्चे को कुछ न कुछ सुनाना जरूरी था .यह कविता स्कूल की हिन्दी की किताब में थी, सुनाते समय वह बहुत नर्वस थी ,जल्दी-जल्दी बोल गई.
पहला झूठ सात साल की उमर में -स्कूल न जाने के लिए मम्मी को बोल दिया कि आज तो स्कूल में छुट्टी है .पर स्कूल से दायीं माँ लेने आ गई .वह  छुप गई पलंग के नीचे पर झूठ तो पकड़ा गया था .




Thursday 6 October 2011

सूर्पनखा


राम को पता है कि उन्हें रावण से युद्ध करना है ,सीता को छुड़ाना है.
रावण को पता है कि उसे भी युद्ध करना है ,उसे समझाने वाले सब हैं कि वह गलत कर रहा है पर वह समझना ही नही चाहता राम को युद्ध न करने के लिए कोई नही कहता ,उन्हें तो सब सहयोग देते हैं,सीता को छुडाने के लिए युद्ध तो करना ही पड़ेगा.इसलिये उन्होंने युद्ध किया और विजय प्राप्त की.सबका आशीर्वाद उनके साथ था.
रावण के साथ दिल से कोई भी नही था .
हमारा आपका जीवन किस तरह से अलग है ?हमारे साथ भी अन्याय होता है,पर हम राम नही हैं ,न ही हमारे साथ अन्याय करने वाला रावण है .
हम बस इतना जानते हैं कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है.तो क्या हम सूर्पनखा हैं .
लगता तो ऐसा ही है क्योंकि हम भी अपने मतलब के लिए लोगों से मीठी बातें करते हैं और जब मतलब पूरा नही होता तो अपना असली रूप दिखाते हैं.
जब सूर्पनखा अपने असली भयंकर रूप में आयी तभी लक्ष्मण ने उसके नाक कान काटे .(और वो अपने खिलाफ हुए इस अन्याय की शिकायत लेकर अपने भाई रावण के पास पहुंच गई.)
हम सब भी तो भीतर से भयंकर रूप वाले हैं,सामने -सामने मिठास से भरे हैं.राम बाहर भीतर एक से ही थे .

Monday 3 October 2011

श्रद्धा क्यों जरूरी है.

हमारी आँखे हैं इसलिये हमें जब दिखाई देता है कि सामने कांटे हैं तो हम बच कर निकलते हैं.असावधानीवश अगर कांटा चुभ भी जाये तो उसे निकाल देते हैं क्योंकि हमे दिख रहा है कि कहाँ चुभा है.पर जो अंधे हैं उन्हें तो कोई आंखवाला ही रास्ता दिखायेगा न .या उन्हें खास ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी कि किस तरह से कंटीले रास्तों से बच कर निकल सकते हैं.
और वैसेभी जिनकी आँखें हैं वह स्वाभाविक तौर पर उस व्यक्ति की मदद करने लग जाता है जिसे दिखाई नही पड़ रहा है.
इसीतरह आँखें शरीर की ही नही मन की भी होती हैं पर अधिकतर लोगों की आँखें बंद ही रहती हैं कुछ ही हैं जो अपनी आंखें खुली रखते हैं और उनकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि बाकी के मनुष्य भी अपनी बंद आँखों को खोलें ,साफ-साफ देखें कि कहाँ-कहाँ से उनके दिल में कांटे चुभ रहे हैं.कैसे उन काँटों से बचें और जो चुभ चुके हैं कैसे उन्हें निकालें .
इसीतरह सामने अगर हीरे पड़े हों तो अंधा तो उन्हें कंकड़ ही समझेगा न .आंखवाले पर श्रद्धा होगी तभी हीरे इकट्ठे करेगा महात्माओं की बातें हीरे की तरह मूल्यवान होती हैं पर मन के अंधे मनुष्य श्रद्धा न होने से उन्हें बकवास समझते हैं और भीतर से गरीब के गरीब ही बने रहते हैं.

Tuesday 20 September 2011

शरीर को देखें जरा नए ढंग से

भगवान शब्द में पांच   अक्षर है -भ ग व आ न -भ है भूमि के लिए ,ग है  गगन (आकाश)के लिए व है वायू के लिए ,आ है आग  के लिए और न है नीर  (पानी)के लिए .तो इस तरह से हम सब भगवान से ही बने हैं .
हमारे शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और पांच कर्मेन्द्रियाँ .पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ इन पांच तत्वों से कुछ इस तरह से सम्बन्धित हैं जैसे कि भूमि से नाक,आग से आँखें ,हवा से त्वचा ,आकाश से कान और पानी से जीभ .
पाँचों कर्मेन्द्रियाँ इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की सहायक हैं -मलेन्द्रिय  नाक की ,पैर आँखों के ,हाथ  त्वचा के ,गला  कान का और जननेंद्रिय  जीभ की.कैसे?ये आप थोड़ा सोच कर देखें  तो पता चल जायगा.
इन पांचो तत्वों में मुख्यतःपांच तरह की विशेषताएं भी हैं,जैसे भूमि में सहनशीलता ,आग में पवित्रता ,हवा में शीतलता आकाश में व्यापकता और पानी में विनम्रता.सो हमारा भी यह सहज स्वभाव होता है कि जब हम सहनशील ,पवित्र,शालीन व्यापक और विनम्र होते हैं तो अपने में आनंद महसूस करते हैं.पर जब असहनशील,अपवित्र ,घमंडी ,संकीर्ण और अकड़ वाले होते हैं तो दुखीः होते हैं.
असहनशीलता का सम्बन्ध नाक से है और नाक का मिट्टी से , तभी तो जब कोई किसी बात को सहन नही कर पाता तो कहते हें कि गुस्सा तो इसकी नाक पर रहता है.अगर हम चाहते हैं कि हमारी नाक पर गुस्सा न रहे तो हमे भूमि की तरह सहनशीलता का गुण अपनाना ही होगा वरना मिट्टी में मिलते देर नही लगेगी ,आकाश की ऊंचाईयां छूने के लिए सहनशील बनना ही होगा.
अपवित्रता का सम्बन्ध आँखों से है और आँखों का आग से.अगर हम चाहते हें कि कोई हमे बुरी नजर वाला न कहे तो हमे आग की तरह पवित्रता का गुण अपनाना ही होगा वरना आग में जल कर नष्ट होते देर नही लगेगी.
घमंड का सम्बन्ध त्वचा से है और त्वचा का हवा से ,अगर हम चाहते हैं कि कोई हमे मोटी चमड़ी वाला न कहे तो हमे हवा की तरह शालीन बनना होगा वरना तो हवा हमें कब तिनके की तरह उड़ा देगी पता भी नही चलेगा.
संकीर्णता का सम्बन्ध कानों से है और कानों का आकाश से .अगर हम चाहते हैं कि हमे कोई कान का कच्चा न कहे तो हमें आकाश की तरह व्यापक द्रष्टिकोण वाला बनना होगा वरना आकाश की व्यापकता में हम कहाँ गुम हो जायेंगें पता भी नही चलेगा.
अकड़ का सम्बन्ध जीभ से है और जीभ का पानी से ,अगर हम चाहते हैं कि हमे कोई लम्बी जबान वाला न कहे तो हमें पानी की तरह विनम्र बनना होगा .वरना चुल्लूभर पानी में डूबकर मरते देर नही लगेगी.
और इन पाँचों तत्वों का प्रतिनिधित्व हमारे हाथ का अंगूठा और चारो उंगलिया भी करती हैं 
.अंगूठा आग का ,तर्जिनी ऊँगली हवा का ,बड़ी ऊँगली आकाश का ,उसके साथ वाली अनामिका भूमि का और छोटी ऊँगली पानी का .
इसीलिये आँखों का ,त्वचा का ,कान का ,नाक का या जीभ का कोई रोग हो तो इन्ही पांचो उँगलियों का उसी हिसाब से एक्युप्रेशर करना होता है.
इस तरह से भगवान हमारी हथेली में भी निवास करता है .आशीर्वाद हथेली से ही दिया जाता है.हमारी तकदीर हमारे हाथ में है .ऐसा भी इसी लिए कहते हैं.






Thursday 8 September 2011

अवेयरनेस और इगो

अवेयरनेस क्या है ?इगो क्या है ?टी.वी.पर कनुप्रिया और ब्रह्मकुमारी शिवानी की बातचीत में और अच्छी तरह समझा .
अवेयरनेस का मतलब है कि जो भी हमारे भीतर चल रहा है हर वक्त उसपर नजर रहे.
इसी को द्रष्टा भाव में रहना कहते हैं ,पहले भी सीखा है कि साक्षी भाव में रहो.
इगो का मतलब है कि अपनी गलत पहचान को अपनी असली पहचान समझना . जैसे कि कोई डॉक्टर है ,उसके डाक्टरी के काम में कोई रुकावट आ जाये और वह परेशान हो जाये कि अब तो वह गया ,सब कुछ समाप्त हो गया.
पर डॉक्टर होना तो उसका एक रोल प्ले है .डॉक्टर का रोल प्ले करना है उसे, पर वैसे तो वह एक शुद्ध आत्मा है .डॉक्टरी के बारे में सब कुछ भूल कर भी असल में वह जो है ,वह तो हमेशा से ही है.उसे अपने असली रूप के बारे में हमेशा अवेयर रहना होगा तभी कोई भी रोल प्ले आसानी से शांत मन से कर सकेगा .रोल प्ले भी दिल से होना चाहिए,सिर्फ एक्टिंग की तरह नही और ऐसा तभी हो सकता है जब हम देखते रहें कि कैसे क्या कर रहे हैं.

Wednesday 24 August 2011

साक्षीभाव

सुबह आँख खुलते ही ख्याल आया कि मैं देख रही हूँ अपनेआपको कि उठने में आलस आरहा है .मन में कुछ इसतरह से विचारप्रक्रिया चली कि उठो या न उठो ,मुझे तो कुछ फर्क नही पड़ता .मैं तो सम्पूर्ण हूँ जल्दी उठने या देर से उठने से मुझे तो कोई फर्क पड़ने वाला है नही पर तुम्हारा ही चेहरा लटक जायेगा कि आज भी ठीक से योगा नही कर पाई देर से उठनेकी वजह से .ठीकसे योगा करना शरीर को तन्दरुस्त रखने के लिए जरूरी है.शरीर अस्वस्थ रहा तो रोजमर्रा के काम ठीकसे नही हो पायेगें,तो भई मेरा काम तो देखना है ,मैं तो देख रही हूँ कि तुम उठने में आलस कर रही हो फिर परेशानी में पड़ोगी तो वह भी देख लूँगी और हंसी आयेगी तुमपर कि चाहती कुछ हो और करती कुछ हो.सर्दी,गर्मी बारिश, धूप-छाँव ,रोशनी-अँधेरा इन सबका प्रभाव तुम्हारे शरीर पर पड़ता है तो उसकेलिए क्या सावधानी करनी चाहिए सब पता है.मैं तो साक्षीभाव से देख रही हूँ .तुम्हे पूरी आजादी है सोई रहो देरतक ,मुझे क्या लेनादेना .और फिर मैं लेटी न रह सकी उठ ही गई.

Wednesday 27 July 2011

कसौटी



हमारा भौतिक संसार परमात्मा का ही स्थूल रूप है.और इस संसार में हमारा जो आपसी व्यवहार है,हमारी जो इच्छायें,कामनायें हैं ,राग-द्वेष है ,वह सब स्वप्न के संसार से ज्यादा स्थाई नही है.जैसे स्वप्न में हम बेसिरपैर के अनुभव से गुजरते हैं ठीक वैसा ही जाग्रत अवस्था का संसार भी है क्योंकि असल में हम जाग्रत होते ही कहाँ हैं सिर्फ लगता है कि जगे हुए हैं.कुछ बनने के कुछ होने के नशे में डूबे हुए ही तो रहते हैं हम सब.सारी लड़ाईयां,सारे वाद-विवाद उसी कुछ होने के ,अपने को सिद्ध करने की आकांक्षा से ही तो उपजते हैं .जो व्यक्ति जगा हुआ है उसे पता है कि जो है सो है,कुछ और बनने की चेष्टा किसलिए ?
तो हर समय जाग्रत रहने के लिए मैने समय -समय पर कई सिद्धांतों का सहारा लिया.
पहला सिद्धांत जो याद आता है ,वह यह है कि -यह भी बीत जायेगा .यानि जब भी मन किसी समस्या से दो चार हुआ तो यह कह कर उसे सहारा दिया कि यह भी बीत जायेगा ,कोई भी समस्या हमेशा नही रहती ,परेशान होना छोड़ो और आगे बढ़ो .आगे तो बढ़ गई पर मन में यह आता रहा कि ऐसा कब होगा जब कोई समस्या आये ही न .
इसलिए दूसरा सिद्धांत लिया कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता .तो फिर सोचना क्या ?सारी समस्याओं का कारण और हल दोनों ईश्वर ही तो है .पर जिस तरह पहला सिद्धांत हमेशा मन को संतुष्ट नही रख सका उसी तरह सब कुछ ईश्वर को सौंप देने से भी बात नही बनी .कुछ सही न होने पर मन अपनी जिम्मेदारी ले लेता है और फिर परेशान होता है .तो फिर तीसरा सिद्धांत लिया कि पल -पल जियो ,पुराना अगला भूलो यानि भूत-भविष्य के चक्कर में न पड़ो,वर्तमान में रहो .
पर क्या आसान है इतना!मन तो पल में कहाँ-कहाँ दौड़ जाता है उसे वर्तमान में टिकाएँ कैसे .टिकना तो उसका स्वभाव ही नही है ,उसका धर्म ही नही है ,हमेशा गति में रहना ही तो उसका लक्षण है,-रुका और खत्म हुआ .तो वर्तमान में रहना ,पल -पल जीना भी इतना सरल नही है .
फिर चौथा सिद्धांत लिया -साक्षीभाव में रहो .मतलब जो भी सोचो.करो उसकी गवाह रहो जैसेकि अब मै यह सब इस लैपटॉप पर लिख रही हूँ तो यह तो लिखा हुआ एक दिन खत्म हो जायेगा ,लेपटोप भी नही रहेगा , ,पर मेरा वह स्वरूप तो हमेशा रहेगा जिसपर यह लिखपाने या न लिखपाने का खेल चल रहा है, जिसे पता है किएक समय ऐसा भी था कि जब लिखना आता ही नही था ,और आगे भविष्य में क्या कुछ लिखने वाली हूँ या सब कुछ भूल जाऊँगी.फिर भी जिसे यह पता है कि जो गवाह है ,साक्षी है ,वह तो हमेशा रहने वाली है .और यह सिद्धांत तो महा सिद्धांत निकला क्योकि जब हर समय साक्षी बन कर नजर रखी तो हरपल पर ध्यान तो स्वाभाविक होने लगा और जब हरपल पर ध्यान रहने लगा तो पाया कि सच ही तो ईश्वर की मर्जी के बिना कहाँ कुछ हो सकता है .जब इस बात को माना तो पाया कि पहला सिद्धन्त भी कसौटी पर खरा उतरता है कि यह भी बीत जायेगा क्योंकि हरपल बीतता हुआ ही नजर आ रहा है .
इसलिये हरसमय साक्षीभाव रखना है बस .ये है महामंत्र या महासिद्धांत ,कुछ भी नाम दे दूँ.

Sunday 24 July 2011

सबका धर्म एक -ओशो

ओशो के सत्संग में सुना कि धर्म तो एक ही है जैसे कि ईश्वर एक है पर नाम अलग अलग हैं.इसी तरह कोई जैन तो कोई बुद्ध तो कोई मुसलमान तो कोई ईसाई हो सकता है पर जरूरी नही कि वह धार्मिक भी हो.धार्मिक तो वही होता है जो धर्म का पालन करता है.हिंदू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई होने से ही कोई धार्मिक नही हो जाता .
जैसे स्वास्थ्य एक है पर बिमारियाँ अलग- अलग हैं .उसी तरह धर्म तो एक ही है.हिंदू मुस्लिम होने पर हम अलग अलग कर्मकांडों का पालन कर सकते हैं पर धार्मिक मनुष्यों के मन की स्तिथि एक जैसी होती है.जैसे शांत मनुष्य सब भीतर से एक सा ही महसूस करते हैं.अशांति के कारण अलग -अलग हो सकते हैं
तभी तो सत-चित्- आनंद एक ही है .खुशी विभिन्न तरीकों से मिल सकती है पर उससे मिलने वाला आनंद एक जैसा ही होता है.भीतर से सबका धर्म एक हैं.   

Sunday 17 July 2011

स्वस्थ यानि स्वयं में अस्थ

हम स्वस्थ कब होते हैं जब अपने में अस्थ होते हैं .वह इस तरह कि आमतौर पर हम या तो खाने के पदार्थों में अपने को उलझाये रखते हैं या पहनने की चीजों में या रहने की जगहों में यानि हर वक्त कुछ पाने की लालसा में रहते हैं,अपने में अस्थ कम ही होते हैं उसी के लिए ध्यान में बैठने की सलाह दी जाती है,कम से कम तब तो अपने में अस्थ होंगे हालाँकि वह भी बहुत मुश्किल होता है क्योंकि मन टिकता कहाँ है?
हम जब तक प्रकृति में उलझे रहेंगे तब तक स्वस्थ नही हो सकते और प्रकृति का ही दूसरा नाम माया है.यही है ईश्वर की शक्ति जो अपना काम बड़े चुपचाप ढंग से करती रहती है.पर हम चाहते हैं कि हमारे ढंग से करे.क्यों करे वह हमारे ढंग से.उसे हमे ही नही देखना है,अरबों की संख्या में हैं उसके बच्चे.वह चुपचाप उन्हें जन्म देते पालती पोसती रहती है और पुराना होने पर उन्हें बदलती रहती है.,हम खामखाह अपनी मर्जी बीच में लाते हैं .
सर्दी लग रही है .लगेगी ही.चादर ओढ़ लो ,धूप में बैठ जाओ.हीटर आन कर लो.गर्मी लग रही है,सूती कपड़े पहनो,ढीले पहनो.पंखा चला लो .नहो लो.प्रकृति हमे इतनी ठंड क्यों दे रही है .इतनी गर्मी क्यों दे रही है,अरे तभी तो पता चलता है कि बसंत ऋतु क्या होती है . गर्मी देती है तभी तो ठंडे पानी का सुख ले सकते हैं.ठंड देती है तभी तो बर्फ के खेलों का आनंद ले सकते हैं .उन सबसे परेशान होना छोड़ें, वे सब तो केवल शरीर पर ही असर डालते हैं,और उनको सह कर ही वह मजबूत बनता है ,तभी तो लोग जिम जाकर पसीना निकालते हैं .सर्दी गर्मी से अपने शरीर को मजबूत बनाएँ.हम शरीर से अलग रहकर शरीर का उपभोग करने वाले हैं न कि स्वयं शरीर हैं .इसलिए स्वस्थ होकर यानि अपने में बैठकर ध्यान से देखें कि यह शरीर हमे कैसे नचा रहा है.अब हम इसे नाच नचाएं यानि खुद इसके मालिक बनें .

Friday 1 July 2011

एक और सत्संग

नीरू माँ के सत्संग से मन में अपने आप ही चिंतन मनन शुरू हो जाता है.इस समय जो मन में चल रहा है लिखने की कोशिश करती हूँ.
मुझे इन पांचों इन्द्रियों से जो भी अनुभव करने को मिला अच्छा या बुरा ,जैसे खाने को स्वादिष्ट पदार्थ ,पहनने को कीमती वस्त्र ,सुनने को मधुर संगीत,देखने को मोहक दृश्य,सूंघने को सुंदर फूलों की खुशबू.या कहीं से प्रशंसा सुनने को मिली या गालियां सुनने को मिलीं .चोट लग गई या बीमारी आ गई .फटे पुराने कपड़े पहनने को मिले .झगड़े देखने को मिले.बदबूदार जगह रहने को मिले.तो यह सब मेरा कर्मफल ही है.
पर अगर इन सब अनुभवों के होने के समय मैने अपने मन की स्तिथि को ,भावना को अपने वश में रखा तो ये कर्मफल मुझे प्रभावित नही कर पायेंगें .जैसे हम बीमार पड़ते हैं तब दवा खानी पडती है ,तो चुपचाप खा ही लेते हैं,और फिर ठीक हो जाते हैं .वैसे ही कुछ अगर कभी अपशब्द रूपी गाली खानी पड़े तो चुपचाप खा ही लेनी बेहतर है,क्योंकि उससे आगेके लिए सम्बन्ध बेहतर होने के चांस ही अधिक होते हैं .
अच्छे अनुभवों को भी ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत नही है वरना उनके लिए और लालसा हो जायेगी ,लालसा से उनके बंधन में पड़ जायेंगें ,और बंधन तो बंधन ही होता है चाहे लोहे का हो या सोने का हो .क्योंकि यह सारी बातें,सारे सुख -दुःख हमारी पाँचों इन्द्रियों तक ही असरकारी होते हैं .हम स्वयं उनसे अलग हैं .

Monday 27 June 2011

स्वयं को जानने की कोशिश

जो कुछ हम कर रहे हैं वह तो हमे करना ही होगा या कि हमसे करवाया ही जायेगा क्योंकि हमारा यह स्थूल रूप यही सब करने के लिए ही हमे मिला है.हमने ही अपनी सोच से ऐसा स्थूल रूप प्राप्त किया है.कुछ भी करते हुए हमारे अंदर जो भी चलता रहता है उसके अनुसार हम अपना आनेवाला स्थूलरूप गढ़ते रहते हैं ,और यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है.जैसेकि हमारे भीतर चल रहा है कि वह फलां इंसान अच्छा नही है तो हम भविष्य में उस व्यक्ति के प्रति नफरत या उससे दूर रहने की भावना से ग्रसित रहने वाले हैं.और अगर अच्छी भावना आ गई तो भविष्य में उसका भला करने वाले हैं ,इस तरह भीतर जो चलता रहता है वही भविष्य की नींव होती है.नींव जैसी बनती गई उसीके अनुसार आगे का जीवन विस्तृत या संकुचित द्रष्टि वाला होने वाला है.इसलिए हमे चाहिये कि बाहर से ज्यादा अपने भीतर की दुनिया पर ध्यान दें कि वहाँ क्या चल रहा है.ऊपर से अच्छा बनने का उतना फायदा नही है क्योंकि बाहर का काम तो हमारे अंदर सतत चलने वाली प्रक्रिया के अनुसार ही होता है.फिर हम कहते हैं कि हमने तो इतना भला किया उसके साथ और उसने ऐसा किया मेरे साथ .अपने भीतर टटोलें कि क्या हम सचमुच उसके हितैषी हैं या सिर्फ दिखाने भर के.

Monday 6 June 2011

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

कर्म करने में अधिकार है पर फल पाने में नही.मन ही मन इसको स्पष्ट करने की कोशिश की तो समझ में कुछ इस तरह से आया कि जैसे किचन में चाय बनाना तो हमारे अधिकार में है पर कैसे बनेगी ,पीने को मिलेगी या नही ,कुछ नही कह सकते क्योंकि चाय बनाने का सामान पत्ती,चीनी ,दूध भी तो चाहिये ,सामान जिस क्वालिटी का होगा ,चाय भी उसी क्वालिटी की होगी.बनने के बाद उसमे मक्खी गिर गई तो... .इसी तरह और सारे काम हैं,जो सिर्फ हमारे करने भर से पूरे नही होते.हम तो सिर्फ एक अंश तक उसमे सहयोगी होते हैं,कुदरत ही हमे उस काम के लिये प्रेरित करती है .
यहाँ हर किसी का मन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है.तभी तो भीड़ एकमन होकर अनशन कर पाती है.क्रांति कर पाती है.तो इसी तरह से हमारे मन पर भी साथ के मन का असर पड़ता है.जब बहुत सारे मन किसी मुसीबत में पड़ते हैं तो उस मुसीबत से छुटकारा दिलाने की पुकार से कोई संत या महात्मा जन्म ले लेता है और जब बहुत सारे मन घ्रणा करने लग जाते हें तो कोई दुष्ट या आतंकवादी जन्म ले लेता है.हमे इतना अधिकार तो है कि हम संत की साइड लें या दुष्ट की .और हमेशा ही ये दोनों हमारे अंदर रहते हैं ,हमे पूरी आजादी है कि किसे चुनें.उसके बाद तो रब ही मालिक है.

Sunday 22 May 2011

संसार को त्यागे नही ,त्याग से अपनायें

बात सही है कि संसार दुःख है पर सुख भी तो संसार से ही मिलता है.हमे संसार में ही तो भाई,बहिन, अड़ोसी ,पड़ोसी का सुख मिलता है.उनके साथ मेरेपन का भाव भी अपनेआप ही जुड़ जाता है .मेरा घर,मेरा बगीचा ,मेरा देश ,मेरा ब्लाग वगैरह- वगैरह भाव सुख देते हैं.
पर अगर ध्यान से देखें तो सुख सिर्फ तभी मिलता है जब हम इन सम्बन्धों में त्याग की भावना रखते हैं.अगर माँ,बाप अपने बच्चों का ख्याल न रखें तो माँ ,बाप किस बात के ,इसीतरह अगर बच्चे माँ ,बाप का ख्याल न रखें तो बच्चे किस बात के ?मेरा घर जिसे हम कहते हैं उसे सजाने सवांरने मे अपने आराम ,समय और धन का त्याग न करें तो मेरा घर कैसे सुख देगा. हर वह चीज जिसमे मेरा शब्द जुड़ा है उससे सुख पाने के लिये त्याग जरूरी है .अपने समय का त्याग,अपने आराम का त्याग ,अपने धन का त्याग .क्योंकि जिससे हमें कुछ मिलता है उसे हम कुछ न दें तो दोनों ही नही बचते .हर व्यक्ति को पेट भरने के लिये मेहनत करनी ही पडती है पर मेहनत करने की ताकत भी तो पेट से ही मिलती है .पेट सिर्फ अपने लिये ही तो नही खाता.खाना हजम करके हमे मेहनत करने लायक बनाता है.पर जैसे खाना तो हमे रोज पड़ता है ,इसीतरह रोज ही अपने सुखों केलिए कुछ त्याग करना पड़ता है.

Friday 6 May 2011

नए युग की शुरुआत

अभी भी कुछ लोगों के मन में लादेन के मरने का अफ़सोस है .ऐसा ही रहा तो दूसरे लादेन को जन्म लेने में ज्यादा देर नही लगेगी. ढेर सारे व्यक्तियों के दिल की सदभावनाएँ अच्छाईयां किसी एक व्यक्ति के माध्यम से काम करती हैं जैसे की अन्ना हजारे जिन्होंने जनकल्याण के लिये अनशन का बिगुल बजाया .अभी सफलता मिलनी बाकी है पर उसके लिये अभी हमे अपनी सद्भावनाओं में कमी नही लानी है.इसी का नतीजा है ओसामा जैसे आतंकवादी से मुक्ति.हमारे दिल की नफ़रत और बुराइयों ने ही उसे जन्म दिया था. सीधे -सीधे अन्नाह्जारे ने लादेन को मारने की मुहिम भले ही नही छेड़ी थी . पर उससे क्या होता है.हमारे मन के अच्छे और बुरे भावों का ही तो सारा खेल है.

Wednesday 27 April 2011

सत्य साईं राजू +भक्ति=भगवान श्री सत्य साईं बाबा

शून्य क्या है ,कुछ भी नही ,पर जिस अंक में लगा दो उसकी कीमत बढ़ जाती है ,एक की दस हो जाती है ,दो शून्य लगा दें तो सौ हो जाती है .जितने ज्यादा शून्य लगाएंगे कीमत बढ़ती ही जायेगी .उसी तरह भक्ति है ,अपनेआप में तो कुछ भी नही .अपने इष्टदेव का नाम जपें ,चाहे राम हो, कृष्ण हो या कुछ और .कीर्तन करें ताली बजायें,आखिर क्या है इसकी वैल्यू.
जब हम किसी भी काम को राम नाम से (अपने ईश्वर के नाम से )जोड़ देतें हैं ,मेरा मतलब है कि भक्ति से जोड़ देते हैं तो उसकी कीमत उसी हिसाब से बढ़ जाती है ,आप कर के देख लें.
हम कुछ भी करें और यह सोच कर करें कि ईश्वर के लिये कर रहें हैं तो वह काम अनायास ही हो जाता है ,नही भी होता तो भी हमे उसके फलित न होने की चिन्ता नही सताती सो अपने साथ राम को जोड़ो और अपनी कीमत बढाओ ,सत्य साईं बाबा के रूप में उदाहरण आप के सामने है .

Friday 15 April 2011

परमात्मा का दर्शन

परमात्मा हमारे जीवन में कैसे प्रकट होता है ?हम उसकी अनुभूति कैसे कर सकते हैं?इस बारे में मैने कुछ लिखने की कोशिश की है.कहते हैं कि परमात्मा सतचितआनंद स्वरूप है.
हमारे जीवन में सबसे पहले उस आनंद की अनुभूति होती है शिशु को देखकर वात्सल्य के रूप में , क्या वह आनंद ईश्वर नही है ?हमे शिशु को देखकर आनंद के रूप में ईश्वर मिलता है और शिशु को माँ के रूप में ईश्वर की अनुभूति होती है.नवजात शिशु को देखते ही मन आनंद से भर जाता है मनुष्य के बच्चे की तो बात ही अलग है .बिल्ली का बच्चा हो या गाय का बछड़ा,कोई भी नन्हा बच्चा हमारे अंदर आनंद की लहर पैदा कर देता है.
जो नवजात नही हैं,पर हम से छोटे हैं,उनके लिये मन में स्नेह होता है,स्नेह आनंद का ही दूसरा रूप है.उसकेबाद जो हमउम्र हैं,मित्र हैं,उनके लिये मन में जो प्रेम उपजता है वह आनंद का ही तीसरा रूप है .हमसे जो बड़े हैं ,उनके लिये मन में श्रद्धा होती
है .यह आनंद का ही चौथा रूप है .और जो महापुरुष हैं, ईश्वर के भक्त बन गए हैं ,उनकी भक्ति हमे आनंद देती है. भक्ति आनंद का पांचवा रूप है .भक्त तो स्वयं ही सतचित आनंद स्वरूप हो जाता है .इस तरह से देखें तो भक्त स्वयं परमात्मा बनजाता है. जिस तरह मनुष्य शिशु,बालक ,युवा और प्रोढ़ बनता है ,उसी तरह स्वाभाविक रूप से वह प्रोढ़ बनने के बाद भक्त बनता है .इस जन्म में न सही ,अगले जन्म में बनेगा ,मनुष्य की पूर्णता उसी में है .

Tuesday 5 April 2011

जोश में होश न खोयें

क्या यह जरूरी है कि अपने को बड़ा दिखाने के लिये दूसरे को नीचा दिखाया ही जाये. मुझे बहुत बहुत खुशी हुई जब इंडिया ने क्रिकेट में श्री लंका पर जीत हासिल की.पर सब लोग यह भूल जाते हैं कि वह भी सेमीफायनल तक पहुँचा था.वह कोई दुश्मन नही था हमारा,न ही है,फिर लंकादहन जैसी बाते करके उसे दुश्मन क्यों बनाया जा रहा है,श्रीराम ने रावण का वध करने के बाद राज्य अपने भक्त विभीषण को सौंप दिया था.अगर अभी भी श्री लंका या रावण का नाश बाकी था तो श्री राम ने क्या किया था.इस लिये खेल में दूसरे प्रतिद्वंदी देशों को नीचा दिखाना बंद करें.

Monday 4 April 2011

ब्रह्मा विष्णु महेश

इन्सान ने अपनी रक्षा के लिये घर बनाये.छत बनाई.दरवाजे बनाये .तलवारें बनायीं.बंदूकें बनाईं.बम बनाये. तोपें बनाई.सैनिक बनाये .चौकीदार बनाये.सिपाही बनाये.इसी तरह इंसान ने ही मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे चर्च भी बनाये.
अपने अपने भगवान भी बनाये.ईश्वर गाड अल्ला बनाये.ये सब भी अपनी रक्षा के लिये ही बनाने पड़े.अनाज फल फूल भी उसकी रक्षा के लिये ही हें .कपड़े बिस्तर तमाम फर्नीचर भीअपने अस्तित्व को बचाने के लिये ही बनाता है. अगर इन्सान के अंदर अपनी रक्षा की भावना हट जाये तो उसे फिर क्या चाहिये,फिर तो उसे ईश्वर भी नही चाहिये.
पर इन्सान के अंदर प्रेम की भावना भी है.मुख्यतःप्रेम उसे अपने बच्चे से होता है,उसकी रक्षा के लिये वह कुछ करने की शुरुआत करता है,और देखते ही देखते पूरी दुनिया बन जाती है.पर यही प्रेम की भावना कब दूसरे के लिये नफरत में बदल जाती है पता ही नही चलता.नफरत होते ही दुनिया नष्ट होनी भी शुरू हो जाती है.जिस दिन एक एटमबम गिरेगा ,ए़क साथ कई इन्सान दफन हो जायेंगे.अपनी ही रक्षा के सामान से इन्सान खुद अपना ही अस्तित्व मिटाने पर तुला हुआ है ,तो कैसा है ये प्रेम !कैसी है ये प्रेम की भावना! यही है ब्रह्मा विष्णु महेश की परिकल्पना!ब्रह्मा ने बनाया विष्णु ने रक्षा की और महेश ने नष्ट किया.बनना टिकना और खत्म होना हर पल यही चलता रहता है.

Wednesday 30 March 2011

नजर नजर का फेर

हमारे प्रति किसी का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या हैं उसकी नजर में,और उसका व्यवहार निर्भर होता है उसके स्वभाव पर ,और उसका स्वभाव निर्भर होता है दूसरों के उसके प्रति जैसे विचार होते हैं .यानि सभी कुछ एक दूसरे पर कुछ इस तरह निर्भर होता है जैसे अंडा पहले या मुर्गी .क्योंकि हर कार्य का कोई कारण होता है और इस तरह एक जन्जीर सी बनी चली आती है.पर अगर हम दूसरों के द्वारा अपने बारे में की गई निंदा या प्रशंसा से अलग रहते हैं तो स्वयं को इस जंजीर से अलग कर लेते हैं फिर कार्य और कारण का हमारे उपर कोई असर नही होता .

Tuesday 29 March 2011

क्या समझा

क्या समझा -द गुरु ऑफ जॉय -से
जीवन का उद्देश्य समझा .उद्देश्य है परहित के लिये काम करते रहना .अगर मैने बहुत सारा धन कमा लिया तो उससे क्या होगा ?किसी की तुलना में तो कम ही होगा.अगर मुझे कोई बहुत बड़ा पद मिल गया तो उससे क्या होगा.किसी की तुलना में तो कम ही होगा .यानि जीवन में कुछ भी पा लो ,किसी की तुलना में तो कम ही होगा .
तो क्या बहुत सारा धन पा लेने या बहुत बड़ी पदवी पाने को जीवन में सफल होना कह सकते हैं .
पर अगर मैने किसी को निःस्वार्थ भाव से कुछ खाने को दिया या कुछ भी किया तो उसकी कोई तुलना नही होती किसी से .देते रहना, करते रहना यही जिंदगी है ,अगर इसे निकाल दो जिंदगी से तो बचा क्या?बस खाना पीना और सो जाना.
खुशी तो तब मिलती है जब हम प्यार से किसी को कुछ खिलातें हैं ,कुछ उपहार देते हैं,या दूसरा हमे कुछ देता है या हमारे लिये कुछ करता हैं .
हम दूसरों के लिये करें और दूसरे हमारे लिये करें ,यही जिंदगी है. बस यही समझा मैने .

Saturday 19 March 2011

Be happy

सब चाहते हैं खुश होना पर वही खुश रह पाता है जिसे इसका फार्मूला पता हो और फार्मूला बिलकुल साधारण है .
हमे सिर्फ इतना करना है कि हम अपनी किसी भी जिम्मेदारी को बोझ न समझें ,क्योंकि जब तक हमारी आवश्यक्तायें हैं जिम्मेदारी तो रहेगी ही. जैसे कि आप सबने सुना होगा कि एक छोटी सी बच्ची अपने नन्हे से भाई को उठा कर चल रही थी तो किसी ने कहा कि इसे उतार दो तुम थक जाओगी ,तो उसने जवाब दिया कि नही थकूंगी,ये मेरा भाई है. इसका मतलब हुआ कि जब हम प्रेम के वशीभूत होकर कोई जिम्मेदारी वहन करते हैं तो हमे बोझ नही लगतींपर ऐसा तो तभी हो सकता है जब हम अपने पराये का भेदभाव छोड़ दें .होली का त्यौहार यही सन्देश लेकर तो आता है कि सभी को अपने रंग में रंग लो, सबके साथ एक हो जाओ,रंग भले ही अलग अलग हो पर सब अपनी अपनी पहचान भूल कर एक से रंग बिरंगे हो जायें.पर हम बेहिचक उसीके रंग में रंगने को तैयार होते हैं जहाँ हमारा भरोसा होता है कि गलत रंग नही लगाया जायेगा.इंसान पर भरोसा नहीं हो सकता पर ईश्वर पर तो हो सकता है न. नही होता तो शुरु प्रार्थना से करो ,प्रार्थना मांगने के लिये नहीं ,जो कुछ उसने दिया उसके लिये उसे धन्यवाद देने के लिये करो.और ऐसा तभी कर पाएंगे जब थोड़ी देर मौन में बैठेगें ,चुप होकर बैठेगें.

Saturday 12 March 2011

सब हो रहा है

मालूम तो है कि सब अपने आप ही हो रहा है पर कामनाओं को पूरा करने के लिये मन फिर भी प्लानिंग तो करता ही है न.पर पिछले दिनों की हाल ही में हुई ऐसी कितनी ही घटनाएँ हैं जिनसे पता चलता है कि मैने जो भी किया है उसमे प्लानिंग का कोई मतलब नहीं था मुझे अवसर मिलता गया और मै करती गयी .जैसे २६ फरवरी को नए मल्टीप्लेक्स में सात खून माफ मूवी देखना ,फिर २८ को आनन्द स्पा में लंच करना ,४ मार्च को पार्लर से थ्रेडिंग करवाना ,५ मार्च को मधुबन होटल जाकर ज्यूलरी सेट खरीदना.और उसी दिन जट यमला , पगला
, दीवाना मूवी देखना ,वो भी ६ से ९ के शो में .सात और आठ को मेहमान नवाजी का अवसर भी मिला.सुबह ६ बजे अमेरिका की एक प्रियजन से स्काइप पर वीडियो काल भी हुई .लगभग रोज ही कुछ न कुछ ऐसा हुआ है जिसका दूर तक भी कोई ख्याल तक न था.
तो फिर प्लानिंग की जरूरत ही क्या है.असल में बात जरूरत की नहीं है.प्लानिंग करना भी तो सब हो रहा है के अंदर ही आता है.दिमाग का काम टेक्निकल बातों को सोचना है ,दिमाग है ही इसीलिये.ये सारे अवसर हमे मिल रहे हैं पर इनको हैण्डल करते समय दिमाग का यूज तो होता ही है ,जैसे कि पिक्चर देखने जाना है तो किस तरह से तैयार होना है , घर को बंद करना है.किस तरह से बैठना है थियेटर की सीट पर. मेहमानों का स्वागत कैसे करना है ,फोन पर बात कैसे करनी है.हमे मिलने वाले हर अवसर में बहुत से टेक्निकल काम जुड़े हुए हैं ,इस लियेमन को कामनाओं की प्लानिंग से मुक्त करो और देखो कि कौन कौन से अवसर मिल रहे हैं और मै उसको कैसे हैन्डल कर रही हूँ .कामना मुक्त रहने से हमारा दिल स्वाभाविक तौर पर खुश रहता है.

Tuesday 1 March 2011

हम सब एक ही हैं

सभी लोग यह बात तो जानते हैं कि हम जैसा बीज बोयेंगे वैसा ही फल मिलेगा.पर यह नहीं जानते कि जब हम किसी के बारे में मन में कुछ सोच रहे होते हैं अच्छा या बुरा ,तो वैसी धारणा उस व्यक्ति तक पहुँच ही जाती है ,मन मे किसी के लिये कुछ भी सोचना बीज डालना ही है. लोग कहते हैं कि हमने तो उसके साथ इतना अच्छा व्यवहार किया पर उसने बदले में क्या दिया.ऐसा इसलिए कि आप ने ऊपर से तो अच्छा व्यवहार दिखाया पर आपके अंदर उसके लिये कुछ अलग ही चल रहा था.जरूर कुछ कारण रहे होंगे कि अंदर कुछ और बाहर कुछ व्यवहार दिखाना पड़ा होगा.क्योंकि यह सिलसिला तो बहुत पुराना चला आ रहा है,पर अब जब हम जान गये हैं कि आम का बीज बोने पर आम ही फलता है और बबूल का बीज बोने पर बबूल ही फलता है, भले ही हमें किसी ने बीज डालते समय देखा न हो .फल बता देगा कि क्या बोया गया था. इसलिये हमे अपने भीतर सदभावना के बीज ही बोने हैं .हम सब ऊपर से अलग अलग दिखते हुए भी भीतर से जुड़े हुए हैं.

Sunday 20 February 2011

विपासना ध्यान

विपासना ध्यान के बारे में टीवी पर परम पूज्य श्री गोयनका जी से जो सुना और नोट कर लिया था, मै चाहती हूँ कि आप सब भी जान जायें .
ध्यान का तरीका --साँस पर ध्यान दें ,साँस तेज है ,धीमी है,कहाँ छूती है ,कहाँ से यानि दायें या बायें नथुने से आती है .ध्यान भटक जाये तो वापिस लायें साँस पर .अभ्यास करते करते ध्यान साँस पर लगने लगेगा ,और इसके लिये ये तीन बातें भी सहायक हैं---पाप कर्म न करो ,पुण्य कर्म करो.चित को निर्मल करो.पाप कर्म क्या है ,कोई भी ऐसा काम जिससे अन्य प्राणियों को पीड़ा होती हो ,पाप है,सुख पहुँचाना ही पुण्य है.ऐसा करने पर मन खुद ही निर्मल हो जायेगा .मन के निर्मल होने पर हम पाप करेंगे ही नहीं हमसे पुण्य ही होगा.

Monday 14 February 2011

happy Valentine's day

Swami Shivanandji ke aashram se
not to be hurt by others is more difficult then not to hurt others.
start the day with God end the day with God
fill the day with God, this is the way to God.
the world is like a mirror if you smile it smiles if you frown it frowns back.
the best preacher is the heart, the best teacher is world, the best friend is God.
be good, do good, this is the way of divine life.

Tuesday 1 February 2011

कुछ और याद आ गया

अपने मन की बड़बड़ाहट को बंद करें .पेड़ों को देखो ,एक पेड़ छोटा है ,एक लम्बा है .क्या कोई जानवर कभी कहता है तुम छोटे क्यों हो ?तुम लम्बे क्यों हो?न ही आपस में पेड़ एक दूसरे को कुछ कहते हैं .जो है जैसा है बस है .उसे वैसा ही होना था .पर मनुष्य हर वक्त एक दूसरे में मीन मेख निकालने में लगा रहता है .यह ऐसा क्यों है?वह ऐसा क्यों हैं ?इसने ऐसा किया ,उसने वैसा किया.हर समय दिमाग में दूसरों के सम्बन्ध में विचार चला करते हैं .कम से कम उस समय तो विचारों को बंद करें जब वे दुःख देते हैं.दुखी होते रहेगें पर मन की बड़बड़ाहट को बंद नही करेंगे.जो जैसा है उसे वैसा ही रहने देने में क्या परेशानी है जिसका मन दसों दिशाओं में भागाकरता है उसे ही रावण कहते हैं ,जो सब पर कंट्रोल कर लेता है उसे दशरथ कहते हैं और ये दशरथ रूपी शरीर तभी तक है जब तक इसमें राम हैं .राम के दूर जाते ही दशरथ खत्म हो जाते हैं .फिर कुछ नही बचता.दशरथ रूपी शरीर को बचाने के लिये हर समय राम की उपस्तिथि चाहिये.

Saturday 29 January 2011

शेष भाग---जो कुछयाद रह गया

ईश्वर हमे हर पल सहायता देने को तैयार है,सहायता दे ही रहा है,पर हम रिसेपटीव नही हैं,हमारी उसके साथ ट्यूनिंग नहीं है.
यहाँ तीन तरह के लोग हैं ,कुछ हैं मिस्टर नयन ,कुछ हैं मिस्टर कानपुर और कुछ हैं डाक्टर भावेश.यानि कुछ को ईश्वर के सन्देश साफ़ साफ़ दिखाई देते हैं जैसे कि उनके सामने चित्र बने हुए हों . वे हैं मिस्टर नयन .
कुछ को आवाजें आती हैं उससे उन्हें सन्देश सुनाई देने लगते हैं कि उनका आने वाला पल सुखद होगा कि दुखद.वे हैं मिस्टर कानपुर .
कुछ हैं जिन्हें अनुभूति होती है वायब्रेशन होती है वे हैं डाक्टर भावेश.
हमे जिंदगी में अक्सर न्यू टर्न लेते रहना चाहिये .न्यूटन ने गिरते हुए सेब को देख कर आकर्षण का सिद्धांत खोजा.इसी तरह हरेक के जीवन में नए विचार नई खोजें आ सकती हैं ,बशर्ते हम एक रूटीन की तरह जीना छोड़ें.हम अपने रोज के जीवन को जिस तरह से जीते आ रहें हैं,उसी तरह से जीने के बजाय नए नए प्रयोग करें.अपना खाना बनाने का ढंग बदलें ,अपने रहने सहने का स्टाइल बदलें .हर बात में न्यू टर्न लेते रहें ,नए नए आइडियाज को आने का मौका दें.
सबसे बड़ी बात हमेशा खुश रहें यानि जो कर हंस कर कर .हमे हमेशा ईश्वर से ट्यूनिंग बना कर रखनी है.ईश्वर कुछ कहता है पर हमने अपने अंदर के माइक पर इतनी पट्टियाँ लगाकर रखी हुई हैं कि उसमे से कोई आवाज नही सुनाई पडती ,तो हमे ऐसा गुरु चाहिये जो धीरे धीरे इन पट्टियों को खोले ताकि हम ईश्वर की आवाज सुन सकें
आपने पिक्चर्स में अक्सर देखा होगा कि माँ के पास से बेटा निकल जाता है पर उन्हें दिखता नही.हमे लगता है अजीब हैं देखते ही नहीं ,पिक्चर के एण्ड में जाकर मिलन हो पाता है,क्योंकि उनमे आपस में कोई ट्यूनिंग ही नही है.ट्यूनिंग होने पर हमे कुछ ऐसी वायब्रेशन मिलने लगती हैं कि हमे आगे आने वाली घटना का अंदाजा होने लगता है.
और बताया कि जिस तरह हम ट्यूशन लेते हैं इसी तरह हमे ईश्वर से इन्ट्यूशन मिलती है.उसके जरिये हमारा सही सही मार्गदर्शन होता है .इन् ट्यूशन को समझने के लिये हमे अपने को योग्य बनाना पड़ेगा.उसकेलिए हमे चाहिये कि जैसे ही फोन की घंटी बजे ,हम अनुमान लगायें कि किसका फोन हो सकता है.कोई पत्र आये तो हम अनुमान लगायें कि किसका पत्र हो सकता है.इसीतरह दरवाजे की घंटी बजे तो अंदाजा लगायें कि कौन होगा.सबसे पहला विचार जो आया है उसको पकड़ें,बाद में दूसरा तीसरा तो हमारा अपना विचार होगा .जो सबसे पहला नाम आया वह है इन्ट्यूशन.कभी गलत कभी ठीक हो सकती है पर धीरे धीरे हम इसको समझने में कुशल हो जायेंगे ,क्योंकि बाहर से हमे कोई कुछ नहीं बता रहा.हम जो स्वयं हैं भीतर वही सब कुछ जानता है और हमारा मार्गदर्शन करता रहता है लेकिन हम उसे भूल गए हैं और अपने शरीर को ही सब कुछ समझ लिया है.

Tuesday 25 January 2011

जो कुछ याद रह गया .

26-जनवरी2009 को टी .वी .पर सुना गुरु तेजपारखीजी का सत्संग,जिसकी शुरुवात इस वाक्य से हुई कि जोकर हंसकर कर.हमे शब्दों पर ध्यान नहीं देना है हमे उनके अर्थ को समझना है .शब्दों को पकड़ने से हम असली बात नहीं समझ पायेंगें.जैसे शीला ने अपनी मम्मी से पूछा कि पीला रंग बहुत महंगा होता है क्या?मम्मी ने कहा- नही तो ,तो शीला ने कहा कि पड़ोस वाली आंटी तो कह रही थी कि बेटी के हाथ पीले करने हैं पर क्या करूं ?इतने पैसे कहाँ से लाऊँ?तो इसका मतलब शीला ने पीले रंग का शाब्दिक अर्थ लिया उसका तात्पर्य नही समझा.
आप से मैं कहता हूँ कि भगवान दुकानदार है और आपका शरीर एक दुकान है.आप दुकानदार से कुछ भी लेते हैं और भावतोल करते हैं पर यहाँ ईश्वर दुकानदार है और वह बदले में आपसे सिर्फ विश्वास और प्रेम मांगता है.उसमे आपको किसी भी तरह का भावतोल नहीं करना है.आप दुकानदार ईश्वर से कुछ मांगिये और विश्वास दीजिये उसको,आपका काम पूरा हो ही जायेगा.
आप स्वयं शरीर नहीं हैं.यह शरीर बेडरूम में जाकर बेडरूम हो जाता है,खाने की जगह पर जाकर डायनिंग रूम हो जाता है.टी.वी. देखने की जगह पर सिनेमारूम हो जाता है.यह तो एक यंत्र है जिसके द्वारा ईश्वर अपन काम करना चाहता है.काम करता है,आप स्वयं शरीर नहीं हैं.इसको पूरी तरह से अनुभव में लाने के लिये कुछ बातें समझनी होंगी-
१-अपनी गलतियों पर हंसना सीखिये,और आपकी सबसे बड़ी गलती है अपने को शरीर समझना .हमे हर काम हंसते हुए करना चाहिये .हंसी भी चार तरह की होती है.पहली हंसी है जो सिर्फ होठो तक ही रहती है,हम अक्सर एक दूसरे की टांग खीचतें रहते हैं.जैसे एक दोस्त ने दूसरे दोस्त को बैंगन की सब्जी खाते हुए देख कर कहा कि जो बैंगन की सब्जी खाता है अगले जन्म में ै गधा बनता है तो उसके दोस्त ने जवाब दिया कि यह तो तुम्हे अपने पिछले जन्म मै सोचना चाहिये था न.यानि एक ने दूसरे को छेड़ा तो दूसरे ने उसे छेड़ा और एक दूसरे पर हँसे.ऐसी हंसी सिर्फ होठों तक ही रहती है.
दूसरी हंसी बुद्धि से आती है.जैसे सड़क पर एक साइन बोर्ड लगा हुआ था -जिनको जाने की जल्दी थी वे चले गये.इस साइन बोर्ड को पढ़ने से हंसी भी आती है और समझ भी पैदा होती है.
तीसरी हंसी विवेक से आती है कि हम शरीर नहीं हैं.चौथी हंसी ह्रदय से आती है,ऐसा व्यक्ति कितनी भी मुसीबतें आ जायें हँसता ही रहता है.सुख आने पर तो सभी आनन्दित होते ही हैं ,पर दुःख आने पर भी जो हंस सके वह है ह्रदय की हंसी .ए़क व्यक्ति का उदाहरण देते हुए समझाया कि वह हर परिस्थिति में हँसता था ,उससे उसकी हंसी का रहस्य पूछा गया तो उसने बताया किउसकी माँ ने मरते समय उसे कहा था कि बेटा ,कितनी भी मुसीबत आ जाये तू अपनी हंसी मत छोड़ना ,जिस दिन तेरी हंसी बंद हो गयी ,उस दिन तू जिंदगी से हार गया,इसलिए मैं कभी अपनी हंसी नहीं छोड़ता क्योंकि मुझे जिंदगी से हारना मंजूर नही.
पर हम सबको ऐसी हंसी हंसते हुए कामनसेंस से काम लेना होगा.हंसी अंदर से महसूस होनी चाहिये जोर जोर से आवाज करते हुए हंसने की उसमे कोई जरूरत नहीं है,क्योंकि उससे तो जो हमारे आसपास परेशान और दुखी लोग हैं वे और भी ज्यादा दुखी हो सकते हैं.जो व्यक्ति भीतर से खुश है उसकी आँखों से आनंद झलकता है.
जब हम खुश हो जाते हैं तो चुम्बक बन जाते हैं,चुम्बक सारी सकारात्मक एनर्जी को अपने पास खींचता है.और जब हम दुखी होते हैं तो पीतल हो जाते हैं,जो नकारात्मक एनर्जी को अपनी और खीचता है,सो हमे नकारात्मकता से भी बचने के लिये खुश रहना चाहिये ,उससे हम चुम्बक की तरह हर तरह कीसुख समृद्धि को अपनी तरफ आकर्षित करेंगे.
शेष अगली बार.






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Monday 17 January 2011

ब्राह्मण,क्षत्रिय ,वैश्य और शुद्र

ओशो की सी.डी.में सुना कि मुख्यतः दो तरह के लोग होते हैं ,एक ब्राह्मण दूसरा क्षत्रिय .अंतर्मुखी ब्राह्मण होता है और बहिर्मुखी क्षत्रिय होता है.अंतर्मुखी अपने में ही मस्त रहता है.जो सिर्फ शरीर के तल पर ही जीता है ,वह शुद्र होता है.शरीर
से उपर उठकर बुद्धि के स्तर पर जीनेवाला ब्राह्मण होता है.बहिर्मुखी अपने को प्रदर्शित करना चाहता है ,जो पूरी तरह से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर पाता है वह क्षत्रिय होता है,जो नहीं कर पाता वह वैश्य होता है.
एकतरह से कह सकते हैं कि ब्राह्मण और शुद्र एक ही जाति के दो छोर हैं ,एक छोर पर शुद्र खड़ा है लोगों की सेवा करता अपने शारीरिक बल से,तो दूसरे छोर पर ब्राह्मण खड़ा है लोगों की सेवा करता अपने दिमाग से.दोनों ही लोकसेवक हैं.
इसी तरह एक छोर पर क्षत्रिय हैं तो दूसरे छोर पर वैश्य हैं.क्षत्रिय सुरक्षा की गारंटी देता है तो वैश्य वह देता है जिसकी सुरक्षा चाहिये.
और कब वैश्य क्षत्रिय में रूपांतरित हो जायें और क्षत्रिय वैश्य में पता ही नहीं चलता है.तभी तो सेना में घोटाले होते हैं ,रक्षा करने के बजाय वे व्यापार शुरू कर देते हैं,और व्यापारी अपने हाथ में हथियार उठा लेता हैं.दोनों जातियों में रक्षा की भावना प्रमुख है
इसी तरह जब शुद्र पढ़लिख जाता हैतो वह दिमाग से सेवा करने लगता है,और जब ब्राह्मण अनपढ़ रह जाता है तो वह हाथ पैर से सेवा करता है.दोनों जातियों में सेवा भाव है.

Tuesday 11 January 2011

एक और सत्संग

गुरु तेज पारखी जी का सत्संग टी.वी. पर सुना .
उन्होंने बताया कि ईश्वर ने यह सृष्टि रूपी जो लीला रची है -खेल बनाया है,इसके कुछ नियम भी बनाये हैं.जो उन नियमों के अनुसार चलता है,वह खेल का पूरा आनन्द लेता है.
जैसे किसान बीज बोता है,फिर बीजों की तुलना में कई गुना अधिक फसल पाता है,उसी तरह हमे विश्वास बीज बोना चाहिये.हम मंदिर में जाकर भगवान से कुछ मांगते हैं और कहते हैंकि अगर मेरी यह मांग पूरी हो गयी तो मै तुम्हारे लिये इतने रुपये का प्रसाद चढाऊंगा ,या इतना दान दूँगा .वगैरह कुछ भी मन्नत मानते हैं,पर पहले अपनी मांग पूरी करना चाहते हैं.
जबकि ईश्वर के खेल का नियम है कि पहले दो फिर पाओ.
इसलिए देने का काम हमे अपने अड़ोसपड़ोस से शुरू करना चाहिये.जब भी कुछ देने का अवसर मिले,इस विश्वास के साथ दें कि विश्वासबीज बो रहे हैं,और जब कोई बीज बोते हैं तो कई गुना बढ़ कर हमे मिलता है .तो इसी तरह जब भी हम किसी को कुछ दें ,चाहे वह उसकी जरूरत पूरी करने के लिये हो या उसका बर्थडे गिफ्ट हो .चाहे धन के रूप में दें,चाहे अपना समय दें ,चाहे किसी की परेशानी सुनने के लिये अपना कान दें .या किसी के पक्ष में बोलने के लिये अपना गला दें ,अपनी जुबान दें.यानि शरीर से ,धन से. मन से देना शूरू करें .
इस खेल में नियम यह भी है कि हमे जब भी मिलेगा तो यह जरूरी नहीं है कि हमने जिसे दिया है उसीसे हमे वापिस भी मिले.हमे मिल किसी और से भी सकता है.जिसको दिया है उससे तो हो सकता है -देने के बावजूद निंदा सुनने को मिल जाए.पर फिर भी हमे अपना देने का काम बंद नहीं करना है.किसान जब फसल उगाता है तो कभी कभी उसे नुक्सान भी उठाना पड़ता है.पर वह बीज बोना बंद नहीं करता.
हम जब भी कुछ देते हैं किसी भी रूप में देते हैं तो यह सोचें कि ईश्वर को दे रहे हैं.और जब हमे कुछ भी मिलता है ,किसी भी रूप में मिलता हैतो समझें कि ईश्वर ही दे रहा है.नियम यही है कि पहले हमे ईश्वर को देना है फिर हमे मिलेगा .इसी थीम पर ईश्वर ने इस संसार को रचा है.
समुंद्र का पानी पहले भाप बनकर ऊपर जाता है फिर वही बारिश बनकर उसे वापिस मिलता है.
हम इस नियम को चेक करने के लिये एक उपाय करें कि एक कापी में लिख कर रखें कि आज हमने इस तरह से ईश्वर को यह दिया यानि विश्वासबीज बोया और उस के फलस्वरूप हमारा यह काम हो जाएगा ,आप लिखते जाएँ और चेक करते जायें .

Wednesday 5 January 2011

अपने काम से काम रखो

हर बात के पीछे कोई कारण होता है ,सो किसी को भी ये क्या कहना कि उसने ऐसा क्यों किया ?चाहे वह रावण हो या कंस,या हम और तुम .सभी के पास उनके कारण तो होंगें ही .या फिर हमे सबसे पहले उस कारण पर पहुंचना चाहिये जो प्रथम है.और उसके लिये तो ईश्वर ही जिम्मेदार है,उसी ने दुनिया बनाई.ईश्वर से सवाल नहीं किये जा सकते.उसकी तो लीला है न्यारी.उत्तर यही मिलता है आखिर कि अपने काम से काम रखो,तुम्हारा इतना ही रोल है बस.